मैं इकट्ठा क्यों करता हूँ?

व्यापारी और वैज्ञानिक दोनों एक मामले में नास्तिक होते हैं। उन्हें ये भ्रम होता है कि सत्य जाना जा सकता है। एक कहता है: ‘’सत्य को जान कर के बुद्धि में कैद कर लूँगा,’’ और दूसरा कहता है, ‘’जीवन में जो ही पाने योग्य है, उसे पा कर के तिजोरी में कैद कर लूँगा।’’ एक ने ऊँचे से ऊँचा स्थान ज्ञान को दिया होता है, और दूसरे ने ऊँचे से ऊँचा स्थान धन को दिया होता है। इन दोनों की ज़िन्दगी में समर्पण नहीं होता। इन दोनों की ही जिंदगी में ये भाव नहीं होता कि, ”जो उच्चतम है, ना मैं उसको मानसिक रूप से जान सकता हूँ, ना ही किताबों में लिख सकता हूँ, और ना ही अपने बैंक अकाउंट में कैद कर सकता हूँ।”
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दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे

मन वाणी का स्वामी रहे, विवेक मन का स्वामी रहे और विवेक आत्मा से उद्भूत हो और आत्मा से क्या अर्थ है? वही जो मेरा तत्त्व है, जो मेरा मूल तत्त्व है। सब कुछ उससे जुड़ा हुआ रहे, वही स्रोत रूप रहे। मन स्रोत में समाया हुआ है, मन स्रोत में समाया हुआ रहे। यही जब मन स्रोत से अलग होता है उसी को फिर भक्ति वाणी विरह का नाम देते हैं। मन का स्रोत से अलग हो जाना ही विरह है।
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मन का दमन व्यर्थ है

मन केन्द्रित रहे उसपर जो कभी बह नहीं सकता, और मन पूरी तरह बहता रहे उसके साथ जो मन का पदार्थ ही है, समय।
समझ रहे हैं बात को? तो जब सुबह है तो मन के लिए सुबह ही रहे, और जब शाम है तो मन के लिए शाम ही रहे। शाम के समय मन सुबह में न रहे और सुबह के समय मन शाम में न रहे; मन बहता रहे।

विनाश की ओर उन्मुख शिक्षा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें क्या पढ़ा दिया गया है? बचपन से तुम्हें यही सिखाया गया है कि गणित पढ़ लो, भाषाएँ पढ़ लो, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत पढ़ लो। तुमसे कहा गया है कि इतिहास पढ़ लो पर तुम इतिहास नहीं हो। तुम जो हो, वो तुमको कभी कहा नहीं गया। तुमसे कहा भी नहीं गया कि क्षण भर को रुक कर के अपने आप को भी तो देख लो तो इसीलिए इस अंधी शिक्षा व्यवस्था से जो आदमी निकलता है, तो वैसा ही होता है।
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 जीवन बोझ क्यों?

समझ के बिना उस ऊर्जा को दिशा नहीं दी जा सकती| जिन भी लोगों को जीवन में उत्साह चाहिए, एनर्जी चाहिए, उन्हें उत्साह की फ़िक्र छोड़ देनी चाहिए और समझने की फ़िक्र करनी चाहिए। उनको ये देखना चाहिए ध्यान से कि, ‘’क्या मैं समझ रहा हूँ कि मेरे साथ क्या हो रहा है? क्या मैं ठीक-ठीक समझ पाया हूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ? मेरे मन में क्या चल रहा है, क्या मुझे पता है ठीक-ठीक?’’ आप आलस की फ़िक्र छोड़ ही दीजिये, आप बस ये देखिये कि, ‘’मैं जो कर रहा हूँ, मुझे उसकी समझ कितनी है|’’
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
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प्रत्येक कृत्य में जोश रहे

तुम किसी ख़ास कृत्य में उतकृष्ट नहीं होते। जीवन या तो उतकृष्ट होता है या तो सूना-सूना। इस चक्कर में मत पड़ो कि मुझे ये नहीं, ये मिलेगा, तब जाकर के मेरे जीवन में रौशनी आएगी। मुझे कुछ ख़ास करने को मिले, तब मैं उसमें चमक पाऊंगा।
जहाँ हो जो कर रहे हो, उसी में डूबो और फिर वहाँ से हज़ार रास्ते खुलेंगे। हज़ार रास्ते खुलेंगे।
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