बीमारी का पता चलना इलाज की शुरुआत है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)

लेकिन गन्दगी का ज्ञान होना, बीमारी का ज्ञान होना, शुभ है।

बुरा लगता है, लेकिन शुभ है।

क्योंकि बीमारी का उद्घाटित होना, बीमारी के इलाज की शुरुआत है।

वृत्तियों का दृष्टा बनें या दमन करें? || आचार्य प्रशांत (2019)

हम ‘करने’ को इतने उतावले रहते हैं, कि हम करे बिना जान ही नहीं पाते।

हमारे लिये ‘विशुद्ध बोध ‘जैसी कोई चीज़ होती नहीं है।

हमें तो कुछ खबर लगी नहीं, कि हमने क्रिया करी।

पता लगा नहीं, कि प्रतिक्रिया हुई।

सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम बड़े बेईमान पखेरू हो।

तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के हो।

ऐसा भी नहीं कि राम के प्रति तुम्हारी बेईमानी है, तो संसार के प्रति तुम्हारी ईमानदारी है।

तुम दुनिया के भी नहीं हो।

साक्षित्व का वास्तविक अर्थ || आचार्य प्रशांत (2019)

साक्षित्व अपनेआप में कोई दशा नहीं होती।

साक्षित्व समस्त दशाओं की निस्सारता से परिचित होने का नाम है।  

साक्षित्व अगर अपनेआप में कोई दशा होती, तो फ़िर उस दशा का भी कोई और साक्षी होता न ।

साक्षित्व समस्त दशाओं से मुक्ति का नाम है।

आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: डर और सावधानी में क्या रिश्ता है?

तो सावधानी तो बड़ी ही सहज एवं सरल बात है।

जितने सरल और सहज रहोगे, समझ लो उतना ही सावधान भी हो।

बड़ी हल्की चीज़ है सावधानी। उसमें कुछ करना नहीं पड़ता। कोई प्रयत्न, कोई विचार, कोई आयोजन उसमें शामिल ही नहीं है।

समझ रहे हो बात को? आँखे खुली हैं, इतना काफ़ी है। ध्यान बस इतना रहे कि आँखें खुली होनी चाहिए। वास्तव में खुली होनी चाहिए। कहाँ की? आँखों की भी, और मन की भी।

सावधानी की चिंता छोड़ो, डर से बचो। डर से।

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