मृत्यु का स्मरण – अमरता की कुंजी

सब कुछ एक इंतज़ार है, एक अनवरत प्रतीक्षा है दुबारा वहीं समाहित हो जाने की, जहां से सब उद्भूत हुआ था। समय भी इसीलिये है। समय भी मात्र तभी तक है, जब तक, उसका उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया। जीवन भी इसीलिए है, क्योंकि उसका भी उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया है। सारे डर इसीलिए हैं, क्योंकि अभी, बिछड़े हैं, भटके हैं, केंद्र से दूर हैं। यही हमारी सारी बेचैनी का कारण है, यही हमारे सारे विचारों का कारण है, यही हमारी सारी तलाश, का उद्देश्य है। कहते उसे हम चाहे जो हों, नाम उसे हम चाहे जो भी देते हों, पर समय, संसार, विचार, सब सिर्फ़ इसीलिए हैं, ताकि वो किसी न किसी रूप में, हमें याद दिला सकें कि हमें जाना कहां है। हमें वापस मोड़ सकें, हमारी अंतर्यात्रा शुरू करा सकें।
————
कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

https://href.li/?http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

जीवन रूखा-सूखा

‘इधर और अभी’ आपको पसंद है नहीं। यहाँ एक बातचीत चल रही है और आपमें से कई लोग होंगे जो, ‘इधर और अभी’ में नहीं हैं। वे कहीं और हैं। भविष्य की कल्पनाओं में, अतीत की स्मृतियों में, क्योंकि वह बड़ा आकर्षक लगता है। जो ‘है’, वह कभी आकर्षक नहीं लगता। और लगे कैसे? उसमें डूबना पड़ेगा, उसे समझना पड़ेगा, समझने के लिए ध्यान देना पड़ेगा, ध्यान देने के लिए कल्पनाओं से मुक्त होना पड़ेगा और जब तुम इतनी कल्पनाओं में हो तो वर्तमान में आओगे कैसे?

जो सपने देख रहा हो उसे वर्तमान दिखाई देता नहीं है।
नतीजा? एक बोरिंग वर्तमान। जीते तुम सदा वर्तमान में ही हो; मन सदा भविष्य में है।
————–
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
__________
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

विश्वास, जानना, लक्ष्य

हमें दुःख क्यों होता है? मुझे क्यों दुःख हो अगर मुझे सच पता हो। अगर एक पागल आदमी मुझे गाली दे रहा है, क्या मुझे दुःख होगा? दुःख होने का तो अर्थ ही यही है कि मुझे संदेह है। तुम आओ और मुझसे मिलो और बोलो मैं गधा हूँ और मेरे चार कान हैं- दो आदमी के और दो गधे के। तुम आओ और मुझसे बोलो सर, आप गधे हो। यह दो के अलावा दो और कान हैं; दो आगे और दो पीछे। मैं दुःखी हो जाऊंगा अगर मेरे मन में शंका पैदा हो जाए कि मैं सच में गधा हूँ, तब मैं जरूर बेचैन हो जाऊंगा। जिसे अपना नहीं पता होगा, जिसको अपने जानने में कमी होगी वही तो दूसरो को जानने में दुःखित होगा ना। जिस बारे में तुम जानते हो, उसी के बारे में संदेह होता हैं।
————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

दूर के लक्ष्यों में धूर्तता छुप बैठती है

अगर तुम लक्ष्य की प्रति ईमानदार रहो और लक्ष्य के प्रति ईमानदारी का अर्थ यही होता है कि मेरा लक्ष्य वही है जो मेरे सामने है। भविष्य किसने देखा है ? उसमें तुम कैसे तीर चलाते रहोगे? और ठीक-ठीक बताओ , तुम तीर चला भी लो , तो तुम्हें पक्का है कि तुम वही करना चाहते हो जो आज सोच रहे हो? तुमने कल जो सोचा था, आज भी वही करना चाहते हो? ईमानदारी से बताना। तुमने परसों जो सोचा था क्या तुमने कल वही किया? क्या तुम पंद्रह की उम्र में वही कर रहे थे जो पांच की उम्र में सोचा था? पच्चीस की उम्र में वही कर रहे हो जो पंद्रह की उम्र में सोचा था? ऐसा तो कुछ होता नहीं। न तुम्हारे साथ न किसी और के साथ।
—————-
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
__________
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
—————-
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

जिसे करना है, वो अभी करता है

अगर कुछ तुम्हें वाकई चाहिए, तो तुम यह तो नहीं कहोगे न, कि पचास साल बाद मिले| तुम क्या कहते हो? अगर तुम्हें कुछ चाहिए, तो तुम यह तो नहीं कहोगे कि पचास साल बाद मिले| तुम क्या कहोगे कि कब मिल जाए? तुम कहोगे- ‘’चलो, पाँच साल के अन्दर-अन्दर चाहिए| है न? तुम्हें और ज़्यादा तीव्रता से चाहिए, तो तुम क्या कहोगे? ‘’पाँच महीने में मिल जाए|’’ तुम्हें और तीव्रता से चाहिए, तो तुम क्या कहोगे? पाँच मिनट में और जब तुम वाकई चाहोगे, बिलकुल उसमें बहानेबाज़ी नहीं होगी, तो तुम कहोगे कि ‘अभी’| तुम अपनी चाहत को अभी जीना शुरू कर दोगे| तुम यह नहीं कहोगे कि मुझे यह भविष्य में चाहिए क्यूँकी भविष्य तो मात्र बहाना है, उन लोगों का, जिनमें चाहत होती ही नहीं है| जिनमें चाहत होती है, वो बात भविष्य पर टालते ही नहीं हैं| वो कहते हैं- ‘अभी चाहिए’|
——————
‘आएँ और प्रकाश से अनुग्रहीत हों’
आप सभी आमंत्रित हैं आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में|

दिन एवं दिनांक: रविवार, 30 अक्टूबर
समय: प्रातः 09 बजे से
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर-63, नॉएडा
——————
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

उचित कर्म कौन सा है?

‘गुरु’, ‘करनी’, ‘चेला’। करनी के दो अलग-अलग स्रोत- गुरु और चेला, ठीक है। अब ‘कृष्णमूर्ति’ की भाषा में देखें तो जो करनी गुरु से आती है वो एक्शन कहलाती है और जो करनी चेले से आती है वो एक्टिविटी कहलाती है। कृष्ण की भाषा से देखें तो जो करनी गुरु से आती है वो कहलाती है -‘निष्काम कर्म’ और जो करनी चेले से आती है वो- ‘सकाम कर्म’ कहलाती है, बस यही है।
———————-
25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।
दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर
स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
———————-
कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।
प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

1 2 3 4 5 16