जीवन एक अनवरत प्रार्थना हो

जब आप कहते हैं अनेक इश्वर हैं, तो आप बिलकुल दूसरी बात कह रहे हैं। ‘अनेक हैं नहीं, अनेक है’। है एक, पर है अनेक। एक ही है, पर अनेक है और ये अनेक होना, उसकी एकता का हिस्सा है। इस्लाम में इसी बात को शिर्क बोला जाता है। टू बिलीव इन अ गॉड अदर देन अल्लाह और इस्लाम की सनातन धर्म से एक बहुत बड़ी शिकायत ही ये है कि तुम बहुत सारे ईश्वरों में यकीन करते हो, बहुत सारे कैसे हो सकते हैं? बहुत सारों में यकीन नहीं किया जा रहा है, एक में ही किया जा रहा है पर वो जो एक है, वो अनेक है।

वो कण-कण में है, वो हर जगह है, वो सब में है बहुत सारों में नहीं कोई ये कर रहा है एक ही है और जो कहता हो कि बहुत सारे हैं वो पगला है। अनेक नहीं हैं। अनेक है; एक है जो अनेक है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना

फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे लिए क्या महत्वपूर्ण है और किस बारे में गंभीर हो? यही बुरा है कि किसी बारे में तो गंभीर हो गए न।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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शून्य में नग्न रह जितने लिबास ओढ़ने हों,ओढ़ो

प्रेम एक माहौल है जिसमें सब कुछ हो रहा है। खा रहे हैं, उठ रहे हैं, पी रहे हैं सब प्रेम में हो रहा है। कि जैसे बाहर मौसम अच्छा है, तो जो भी करो अच्छे मौसम में हो रहा है। तो प्रेम एक मौसम की तरह है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
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मुझे क्या पाने की ज़रूरत है?

‘जिनको कुछ ना चाहिए’ का मतलब ये नहीं है की इच्छाएं कहीं मर गई। उनका मतलब ही यही है कि इच्छाएं आती-जाती रहेंगी। सारी इच्छाएं जिसको पाने के लिए है, हम उसको जान गए हैं। आपकी कोई भी इच्छा है — आपने कहा ना ख़ुशी के लिए है — हम उस ख़ुशी को जान गए हैं।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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गुरु जो तुम्हारे नकली सत्यों को नकली दिखा दे

गुरु के साथ यही फ़ायदा है तुमको कि वो तुम्हारी पकड़ में भी है और तुम्हारी पकड़ से बाहर भी है। हरि को कैसे निहारोगे? वो तुम्हारी आँख में समाएगा कहाँ? हरि का कोई रूप है, रंग है, आकार है कि तुम हरि को निहार लो? गुरु का है।
गुरु को निहार सकते हो। अच्छी बात है। सीढ़ी है न वो। रूप, रंग, दृष्टि से शुरू करता है और अ-रूप, अदृश्य में ले जाता है। तुम्हारे पास विकल्प है कहाँ हरि को निहारने का?

तो इसीलिए संतों के पास जब भी यह चुनाव आता है कि हरि को चुनूँ या गुरु को चुनूँ । वो बेख़ौफ़ होकर गुरु को चुन लेते हैं।
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