रूह के राज़ || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2017)

आपके माध्यम से तो अब कई अन्य वृक्ष उगने चाहिये।

अब आप पेड़ से टंगे मत रह जाना।

अब आप दुनिया के तानों की, और हमलों की, परवाह मत करने लग जाना।

ज्ञान इकट्ठा करके नहीं जान पाओगे

जो राह पर चलना ही न चाहता हो, उसके लिए रूमी किसी काम के नहीं।

जिसको अपने घर की चार दीवारों में ही बहुत सुकून मिलता हो, वह दुनिया भर का मान चित्र ले कर बैठा है ‘वर्ल्ड मैप’, तो उसे क्या मिल जाएगा उस मैप से? आप कह रहे हो “ठण्ड बहुत है और यहाँ बड़ा सुकून है, गरमा गर्म।” और हाथ में क्या है आपके? पूरे ब्रह्माण्ड का मान चित्र है। “यहाँ यह है, यहाँ यह है। उधर सत्य के द्वार हैं। आकाश गंगाओं के पार मुक्ति की उड़ान है।”

और तय क्या कर रखा है? कि बैठना इसी चार दीवारी में है, और हाथ में ले के बैठे हुए हो दुनिया का नक्षा।

काहे हो?

काहे को?

जो महत्वपूर्ण है वो टलता रहा, व्यर्थ से जीवन भरता रहा

जहाँ कहीं भी तुम्हारे लिए भविष्य महत्वपूर्ण हुआ, वहाँ समझ लो कि तुम अपने साथ कोई धोखा-धड़ी कर ही रहे हो।

जहाँ कहीं भी तुमने यह कहा कि “जब वह हो जाएगा तब देखेंगे”, इतना समझ लो कि कोई आंतरिक धोखा-धड़ी चल रही है।

असली बात तो होती ही तब है, जब तुमको सच्चाई इतनी साफ़-साफ़ दिखाई दे कि तुम्हारे पास कोई तरीका ही न बचे उसके साथ टालम-टोल करने का।

शाश्वत उन्मत्तता प्रेम की

वक्ता : रूमी की कुछ पंक्तियाँ- ‘प्यार में तुम्हारे नशे के अलावा और कुछ भी शाश्वत नहीं है ! अपना  जीवन लेकर तुम्हारे सामने आया