आदतें स्वभाव नहीं होती

अहंकार जो कुछ भी करता है, अपने पोषण के लिए ही करता है। जब जानने में तुम्हारी आत्म छवि को ही खतरा हो, तब जानना अहंकार नहीं है। तब जानने की कोशिश अहंकार नहीं है। तब वो प्रेरणा कहीं और से आ रही है। अभी हम थोड़ी देर पहले सवालों की बात कर रहे थे। तुम यूँ ही मज़े में बैठे रहकर, अपने आराम में स्थापित रहकर कोई प्रश्न पूछ दो, वो प्रश्न मात्र एक बौद्धिक खुजली है। उसकी कोई कीमत नहीं। एक सवाल वो भी होता है लेकिन जिसको पूछते हुए जबान कांपती है और शरीर थरथराता है क्योंकि इस सवाल का जवाब तुम्हारी जड़ों को हिला सकता है। इस सवाल की कीमत है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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भक्तियोग एवं पुरुषोत्तम योग दीक्षा

भक्तियोग एवं पुरुषोत्तम योग दीक्षा आचार्य प्रशांत द्वारा

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दिनांक: 7 चुनिंदा दिवस 6 मार्च-24 मार्च के बीच

समय: सायं 7 बजे से 9 बजे

स्थान: अद्वैत बोध्स्थल: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर-63, नॉएडा

श्रृंखला का समय: 840 मिनट

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:

श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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बिखरे मन के लिए संसार में टुकड़े ही टुकड़े

जिसे पहली बात तो यह पता ही नहीं कि सारे प्रतिबिम्ब मेरे हैं, इन सब के स्रोत में मैं बैठा हूँ, मैं अर्थात आत्मा। दूसरी बात जिसे ये पता नहीं कि ये अलग-अलग इसलिए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि मन खंडित है और तीसरी बात जो बड़ी मूर्खता है, वो ये है कि, वो बिना खंडित मन को बदले प्रतिबिम्बों को बदलने की चेष्टा में लगा रहता है। आप, जो मध्य में खड़े हैं वो आत्मा हैं। ये जो टूटे-फूटे हज़ार किस्म के शीशें हैं ये खंडित मन है और उन खंडित मनों में जो परिलक्षित हो रहा है वो संसार है।

संसारी वो, जो मन का खंडन रोके बिना, जो मन का उपचार किए बिना, संसार बदलना चाहता हो।

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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया:
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क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है?

प्रश्न: क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है? वक्ता: नहीं। हाँलांकि, विशिष्ट परिस्थितियों के अंतर्गत ऐसा हो सकता है। तुम्हें गुरु के पास वापस आना ही

गहरा प्रेम, गहरा विरोध

अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई। पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई; मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़  निभाईं। -बुल्ले

गिरना शुभ क्योंकि चोट बुलावा है

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥ – अष्टावक्र गीता(३.५) वक्ता: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास

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