इच्छा अपूर्ण, मौज पूर्ण

ध्यान के अभाव में ही तो भ्रम रहता है न? ध्यान है फिर कहाँ कोई पर्दा है? इसीलिए पूछना बहुत ज़रूरी होता है कि ये बात कह कौन रहा है? पर्दा नहीं है, पर्दे के भीतर जो संसार है वही सत्य है, ये कौन कह रहा है? ये दृष्टा कह रहा है। ‘’पर्दा है, और मैं पर्दे से बाहर हूँ, देख मात्र रहा हूँ,’’ ये कौन कह रहा है? ये साक्षी कह रहा है। न दृष्टा सत्य है, न साक्षी सत्य है। कहने में ऐसा लगता है कि जैसे साक्षी मन को देख रहा हो पर भूलियेगा नहीं कि साक्षी भी मन की कल्पना ही है।
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दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे

मन वाणी का स्वामी रहे, विवेक मन का स्वामी रहे और विवेक आत्मा से उद्भूत हो और आत्मा से क्या अर्थ है? वही जो मेरा तत्त्व है, जो मेरा मूल तत्त्व है। सब कुछ उससे जुड़ा हुआ रहे, वही स्रोत रूप रहे। मन स्रोत में समाया हुआ है, मन स्रोत में समाया हुआ रहे। यही जब मन स्रोत से अलग होता है उसी को फिर भक्ति वाणी विरह का नाम देते हैं। मन का स्रोत से अलग हो जाना ही विरह है।
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सत्य और संसार दो नहीं

धार्मिक आदमी वो नहीं है जो मंदिर जाता है, धार्मिक आदमी वो है जिसे मंदिर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि उसके लिए हर दिशा मंदिर है | वो जिस जगह खड़ा है वो जगह मंदिर है | वो मंदिर को अपने साथ लेकर चलता है | वो है, धार्मिक आदमी | वो विभाजन कर ही नहीं सकता | वो रेत पर खड़ा है तो रेत मंदिर है, पत्थर पर खड़ा है तो पत्थर मंदिर है, इमारत पर खड़ा है तो इमारत मंदिर है |

उसको किसी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है, उसको किसी विशेष कक्ष की आवश्यकता नहीं है कि “यहाँ पर ही मेरी पूजा होगी” | जितनी भी मूर्तियाँ हैं, जो भी कुछ मूर्त रूप में है, वही पूजनीय है |

पहला याद रखो,आखिरी स्वयं होगा

श्रोता १: यहाँ पर एक पंक्ति है: गावै तो ताणु होवै किसै ताणु | इसका अनुवाद लिखा था, ‘कोई उसकी शक्ति का गुणगान करे- ये शक्ति

मनुष्य मशीन भर नहीं

वक्ता: यह जो हमारा मस्तिष्क है, यह करीब-करीब एक यंत्र है। सच तो यह है कि हम निन्यानवे प्रतिशत यंत्र ही हैं और जैसे एक यंत्र की

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