आइन रैंड की द फाउन्टेनहेड पर (The Fountainhead by Ayn Rand) || आचार्य प्रशांत (2019)

जवान लोगों को होवार्ड रोअर्क(फाउंटेनहेड के नायक) से मिलना चाहिए!

बहुत कुछ है उससे सीखने को।

बचपना, नादानियाँ, निर्भरताएँ, दुर्बलता और आश्रयता की भावना- इन सबसे एक झटके में मुक्त करा दे, ऐसा क़िरदार है वो।

प्रेम और आकर्षण

आप तीस-चालीस साल किसी भी चीज़ के साथ रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक छड़ी के साथ रहो, तो आप बिछुड़ नहीं पाओगे। आप एक जानवर के साथ तीस साल रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक मोटर कार तीस साल चलाओ, आपसे वो बेची नहीं जाएगी – ये प्रेम नहीं है। और अक्सर जो पुराने लोग होते हैं, थोड़े उम्र दराज़, वो आज कल के लोगों को यही कहते हैं कि तुम्हारा प्यार क्या है? तुम्हारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है। ”मुझको देखो, अपनी दादी को देखो, हम में कोई शारीरिक आकर्षण नहीं, फिर भी हम कितने जुड़े हुए हैं।” उनकी बात यहाँ तक तो ठीक थी कि जवान आदमी का जो प्यार है, वो क्या है? शारीरिक आकर्षण। लेकिन वो भूल गए कि अगर जवान आदमी के पास प्रेम नहीं है, तो प्रेम तुम्हारे पास भी नहीं है। वो जुड़ा है शरीर के वशीभूत होकर और तुम जुड़े हो आदत के वशीभूत होकर।
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शरीर को महत्त्व देना ही है उम्र का सम्मान

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ

शराबखाने में और वक़्त बिताने से होश में नहीं आ जाओगे

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ गया कि कोई बूढ़ा होते ही इज्ज़त का पात्र हो जाता है; सवाल ये है कि तुम अपनी देह को किस रूप में देखते हो? क्योंकि जो किसी दूसरे को इस कारण इज्ज़त देगा कि उसके बाल पक गए हैं, वो स्वयं भी यही अपेक्षा रखेगा कि, ‘’मुझे भी मेरी उम्र के अनुसार अब आदर मिले|’’

तुम्हारे मन से ये भावना हट जाए — दूसरे को छोड़ो — तुम्हारे मन से अपने लिए ये भावना हट जाए कि, “मैं शरीर हूँ, और मुझे मेरी उम्र के अनुसार व्यवहार मिलना चाहिए,” तो फिर तुम पूरे संसार को उसकी उम्र की मुताबिक नहीं देखोगे| तुम अपने आप को उम्र के मुताबिक़ देखते हो ना, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्र के मुताबिक देखते हो| तुम कहते हो, “अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मेरी ये उम्र है, वो उम्र है|” जब तुम अपने आप को कहते हो कि, ‘’मैं जवान हूँ. और जवान होने से ये निर्णय होता है कि मुझे क्या करना चाहिए,’’ तो तुम दूसरे को भी कहते हो कि, “अब ये जवान नहीं है और इसकी प्रौढ़ता से निर्णय होगा कि ये क्या करे?”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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‘यहाँ’ से बेहतर कोई जगह नहीं

कमी हमेशा तुलना के फ़लस्वरूप आती है।

तुमसे पुछा जाये कि प्रशांत महासागर में पानी कितना है? तो तुम कहोगे “बहुत सारा।”
तुमसे पुछा जाये कि “भारतीय महासागर में पानी कितना है”? तुम कहोगे, “बहुत सारा”।

मैं कहूँगा, “दोनों में से ज़्यादा पानी किसमें है?” तो तुम कहोगे “पहले वाले में ‘ज़्यादा’ है और दूसरे में ‘कम’ है।” अब दूसरे में कम कैसे हो गया?

और किसको ‘कम’ बोल रहे हो ?

(हँसते हुए) तुम एक महासागर को ‘कम’ बोल रहे हो क्योंकि तुमने उसकी तुलना कर दी। अब महासागर भी ‘कम’ हो गया!

तुलना मत करो, तो कोई कमी नहीं हुई है। जो हुआ है वही होना था।

आपके जाने के बाद भूल क्यों जाता हूँ?

जब भी कोई समस्या बहुत बड़ी लगने लगे, तो एक सवाल पूछना अपने आप से? “समस्या बड़ी है या मैं छोटा अनुभव कर रहा हूँ।” ईमानदार उत्तर हमेशा एक ही मिलेगा- समस्या बड़ी नहीं है, तुम अपने आप को बहुत छोटा मानते हो। और छोटा मानने का जो कारण है वो बता दिया है

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