जहाँ लालच वहाँ गुलामी

हम जो बार-बार अपनी असमर्थता का रोना रोते हैं, वह कुछ नहीं है, हम एक बड़ा दोहरा खेल खेलना चाहते हैं।

हम कहते हैं, हमारा लालच भी बरकरार रहे और हम गुलाम भी न बनें। यह अब नियमों के विपरीत बात कर रहे हैं आप। आप चाहते हैं आपका लालच भी बरकरार रहे और आपको गुलाम भी न बनना पड़े।

जहाँ लालच है, वहाँ गुलामी है।

जिसको गुलामी छोडनी है, उसे लालच छोड़ना होगा। अगर आप बार-बार पा रहे हैं कि आप गुलाम बन जा रहे हैं, तो देखिए कि क्या-क्या लालच है, उस लालच को हटा दीजिए और गुलामी को हटा दिया आपने।

आध्यात्मिक प्रतीक सत्य की ओर इशारा भर हैं

बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।

संतों ने तो बहुत सरल बातें कही हैं। कुछ उन्होंने कभी टेढ़ा-टपरा करा ही नहीं। टेढ़ा-टपरा आदमी का मन कर देता है उसको।

इच्छा जिसे तलाश रही है वो इच्छा द्वारा मिल ही नहीं सकता

इच्छा जिसको तलाश रही है, वो कभी इच्छा के माध्यम से मिल ही नहीं सकता।

हर इच्छा उसी ‘परम’ को तलाश रही है, और वो इच्छा के माध्यम से मिलेगा नहीं।
क्यों? क्योंकि इच्छा कहती है, “मुझमें कोई अपूर्णता है,”
और परम उनको कभी मिलता ही नहीं, जो कहते हैं, “मैं अपूर्ण हूँ।”

जिज्ञासा और मुमुक्षा में क्या अंतर है?

उपनिषद, वेदों का उच्चतम बिंदु और सारी आध्यात्मिकता का स्रोत हैं।

क्या आप जानते हैं कि सारे उपनिषदों का सार चार रहस्यवादी ‘महावाक्यों’ में निहित है?

इन चार महावाक्यों की समझ ही सम्पूर्ण आध्यात्मिकता है।
———————————————————————

इस बुधवार शाम, सुनिये ‘श्री प्रशांत’ को, चिन्मय मिशन, नोएडा में।

विषय: चार उपनिषदिक महावाक्य।
स्थान: चिन्मय मिशन, सेक्टर-३७, नोएडा।
समय: सायं छः बजे
सम्पर्क: +91 7599386010

आप सभी आमंत्रित हैं।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

1 2 3 4 5 9