अपने करे संसार तो मिला नहीं, परमात्मा क्या मिलेगा

तुम्हारे करें तुम्हें यह संसार ही नहीं मिला, तुम्हें परमात्मा क्या मिलेगा|

तुम कोशिश करते रहे हाथ-पांव चलाते रहें, तुम्हें उतना पैसा तक तो मिला नहीं जितना तुम चाहते थे, तुम्हें परमातमा मिल जाएगा? पूरी कोशिश करके तुम जाते हो टिंडा खरीदने और ले आते हो आलू, टिंडे तुम्हें मिलते नहीं अपनी कोशिशों से, परमात्मा मिल जाएगा? लेकिन हमारी पूरी कोशिश यही है कि परमात्मा भी मिले तो हम यह दावा कर सकें कि हमने पाया| और संत तुमसे कह रहे हैं कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो तुम्हारे करे कुछ नहीं होगा, तुम्हारे करे कुछ नहीं होगा|

हाँ! करना अगर कुछ छोड़ सको, यदि चुप हो करके बैठ सको, समस्त कर्मों को समर्पित कर सको, यह जो करने-करने की चाह है इस को नमित कर सको तो फिर कुछ संभावना है, विचार किया जाएगा, एप्लीकेशन छोड़ जाओ| फिर कुछ हो सकता है| समझ रहे हो बात को?

~आचार्य प्रशांत
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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बंधन चाहने से बंधन मिलता है और मुक्ति चाहने से भी बंधन ही मिलता है

जो तुम्हारे सुन्दरतम सपने हैं, वो साकार हो भी गए, ईमानदारी से बताओ, संतुष्ट हो जाओगे? और ऐसा तो नहीं है कि कभी तुम्हारा कोई स्वप्न साकार हुआ नहीं है, कभी-कभी तो तुम्हारी चाहतें पूरी भी हुई हैं।
उनसे खिल गए तुम? उनसे भर गए तुम? उधर माने क्या? उधर माने स्वप्न, उधर माने चाहतों का, भविष्य का, हसरतों का संसार, उधर माने कल्पना। इन कल्पनाओं ने तुम्हें कोई पूर्ति दी है आज तक? दी है? नहीं दी है, तो अब कैसे दे देंगी? जो आज तक नहीं हुआ, क्यों उम्मीद कर रहे हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के चंद बचे हुए सालों में हो जाएगा?
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जागरण का ताप ही वृत्तियाँ जला देगा

बच्चा नहीं पैदा होता, वृत्तियों का एक पुंज पैदा होता है। उसे जाना होता है, उसे ख़त्म होना होता है। कई लोग सोचते हैं कि व्रत, उपवास रखे ऋषियों ने, इससे उनको मुक्ति मिल गयी, मोक्ष मिल गया। बड़े-बड़े तपस्वी हुए हैं, जिन्होंने बड़ी तपस्या करीं हैं। महावीर का नाम आता है, बुद्ध का नाम आता है। शरीर गला दिया, हाड़ सुखा दिया। ये सब किसलिए था ज़रा समझो तो, मास गलाने से किसी को मुक्ति नहीं मिल जानी हैं। पर मांस गलाना एक प्रकार का मानसिक अभ्यास है। शरीर महत्व नहीं रखता, मन महत्व रखता है।
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दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे

मन वाणी का स्वामी रहे, विवेक मन का स्वामी रहे और विवेक आत्मा से उद्भूत हो और आत्मा से क्या अर्थ है? वही जो मेरा तत्त्व है, जो मेरा मूल तत्त्व है। सब कुछ उससे जुड़ा हुआ रहे, वही स्रोत रूप रहे। मन स्रोत में समाया हुआ है, मन स्रोत में समाया हुआ रहे। यही जब मन स्रोत से अलग होता है उसी को फिर भक्ति वाणी विरह का नाम देते हैं। मन का स्रोत से अलग हो जाना ही विरह है।
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जब चाहो तब मुक्ति

आप किसी भी तल पर पहुँच गए हों, वहां से एक रास्ता हमेशा उपलब्ध होता है लौटने का, हमेशा। अन्यथा फिर वो भूलभुलैया नहीं है, फिर वो लीला नहीं हो सकती, फिर वो खेल नहीं हो सकता। खेल का तो अर्थ ही यही है: जिसमें अभी आपको थोड़ी सम्भावना दी गई है जीतने की, आप जीत सकते हो। ठीक है अभी आप हार रहे हो, लेकिन खेल अभी पूरा नहीं हुआ। जब तक खेल पूरा नहीं होता, तब तक जीतने की सम्भावना है, और फिर वो अभी खेल नहीं है। आप कितना भी फंसे हुए हो, आपके सामने रास्ता एक खुला होता है — बड़ी कृपा है — इसी को अनुकम्पा कहते हैं। भूलभुलैया के किसी भी तल पर जा कर के आप गिरे हो, कितनी भी आपने अपनी दुर्दशा कर ली है, लेकिन फिर भी मुक्ति का मार्ग कभी पूर्णतया बंद नहीं होता।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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