प्रशंसा – स्वास्थ्य का भ्रम

निंदक मेरा जनि मरु, जीवो आदि जुगादि ।  कबीर सतगुरु पाइये, निंदक के परसादि ॥ वक्ता: स्वास्थ्य स्वभाव है और स्वस्थ होने का मतलब होता

पुरुषार्थ या प्रारब्ध?

प्रारब्ध का अर्थ है, ‘मैं मशीन हूँ’ और मशीन का कोई माई-बाप नहीं होता| मशीन के पास चेतना ही नहीं है अपने माई-बाप जैसा कुछ सोचने की| समर्पण का अर्थ होता है, ‘मैं जान गया कि क्या यांत्रिक है, और मैं उसमें नहीं बंधूंगा, समझ गया’| यह ही समर्पण है|

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