हमारी खुशियाँ दूसरों पर निर्भर क्यों?

हम सब का दुनिया से जो रिश्ता है वो बड़ी हिंसा का रिश्ता है|

तुम कभी गौर करो, तुम कहती हो हम अपने सुख के लिये दुसरो पर निर्भर क्यों है? सोचो कि अगर तुम्हे किसी से सुख की उम्मीद हो और वो तुम्हें सुख न दे तो तुम्हारे मन में उस व्यक्ति के लिये कैसे विचार आयेगें ? तुम्हें किसी से उम्मीद थी कि वो आज आकर के तुम्हें कुछ देगा – उपहार| उसने नहीं दिया; तुम्हारे मन में उसके लिये सदभावना उठेगी? या क्रोध उठेगा?

जिसने माँगा नहीं उसे मिला है

हम अपनी ही जड़ों को काटते चले हैं| हमें भय है अपने ही विस्तार से|

किसी ने कहा है कि, “हमें किसी से डर नहीं लगता, हमें अपनी ही अपार सम्भावना से डर लगता है|”

कहीं न कहीं हमें पता हैं कि हम अनंत हैं| कहीं न कहीं, हमें पता है कि क्षुद्रता हमारा स्वभाव नहीं| हम अपनेआप से ही डरते हैं, अपनी ही संभावना से बड़ा खौफ़ खाते हैं| अगर हमें हमारी संभावना हासिल हो गयी, तो होगा क्या हमारे छोटे-छोटे गमलों का? हमें उनसे बाहर आना पड़ेगा|

मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट

मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो,
जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों।

जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों,
विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के,
तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो।

दुःख कहाँ है?

अगर आप हर मोड़ पर दुःख पाते हो, दुःख के नए-नए कारण आपके जीवन में प्रविष्ट होते जाते हैं, तो आपको तलाश करनी पड़ेगी ईमानदारी से कि – “दुःख कहाँ है?”

अन्यथा आप झूठे कारणों को निपटाते जाओगे, उनका निवारण करते जाओगे, हटाते जाओगे, और रोज़ पाओगे कि कोई नया कारण, कोई नई घटना, कोई नया व्यक्ति आ गया है, जिसके कारण आपको दुःख मिल रहा है।

घटनाएँ बदलती रहेंगी, व्यक्ति बदलते रहेंगे, कायम क्या रहेगा? दुःख कायम रहेगा।

निसंकोच संदेह करो; श्रद्धा अंधविश्वास नहीं

संदेह समस्या बनता है, सिर्फ आखरी बिंदु पर| वो बिंदु पूर्ण श्रद्धा का होता है| पर आखरी बिंदु पर यहाँ कौन आ रहा है? तो अभी तो संदेह है तो अच्छी बात है| जितना हो सके उतना संदेह करो| और फ़िर उस संदेह को पूरा खत्म होने दो| और याद रखो कि खत्म करने का ये मतलब नहीं हैं, कि उसे दबा दिया जाये| खत्म करना मतलब उसकी पूरी ऊर्जा को जल जाने दो| उसमें जितनी आग थी, तुमने जला दी| समझ रहे हो न?

अब जल गया, खत्म हो गया| संदेह को खत्म होना ही चाहिए|

सभ्यता किस लिए है?

व्यक्ति से व्यक्ति का कोई सम्बन्ध ही ना रहे क्योंकि व्यक्ति से व्यक्ति का जो भी सम्बन्ध बनेगा उसका आधार तो एक ही है, हमारा अहंकार| हम जिसे प्रेम भी कहते हैं वो कुछ नहीं है वो एक अहंकार का दुसरे अहंकार से मिलना है| बड़े अहंकार का छोटे अहंकार से, माँ अहंकार का बच्चे अहंकार से, पुरुष अहंकार का स्त्री अहंकार से और इस तरह से मिलना है कि दोनों का ही अहंकार बल पाता है|

पुरुष जितना पुरुष स्त्री के सामने होता है, उतना कभी नहीं होता| यदि आप पुरुष हैं तो सामान्यता आप ये भूले रहेंगे कि आप पुरुष हैं लेकिन जैसे ही कोई स्त्री सामने आयेगी, आपका पुरुष जग जाएगा| यदि आप स्त्री हैं तो शायद आपको याद भी ना हो कि आप स्त्री हैं पर आप पुरुषों के बीच में बैठेंगी और आपको तुरंत याद आ जायेगा| आप पल्लू ठीक करने लगेंगी|

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