सत्य – मूल्यवान नहीं, अमूल्य

मूल्यवान वो, जो बहुत क़ीमती है पर उसकी क़ीमत है, सौ का नहीं है, तो एक लाख का है। पर अमूल्य माने वो जो किसी और आयाम में है, डाईमेंशन ही दूसरा है, उसकी क़ीमत लग ही नहीं सकती, वो गिनती से बाहर है। आप मूल्यवान को ख़ोज रहे हो, इसीलिए आपको फिर मूल्यों की गिनती करनी पड़ती है, जो अभी आप कर रहे हो कि, “एक को पकड़ा, तो दूसरा छूटता है तो फिर गणित का हिसाब-किताब करना पड़ता है कि इसका मूल्य कितना था और उसका मूल्य कितना था?”

अमूल्य, ‘उसको’ जानो, ‘उसका’ मूल्य न कम है, न ज़्यादा है। जब कहा जाता है मूल्यवान, तो आपको ये भ्रम हो जाता है कि “अमूल्य वो, जो मूल्यवान से भी ज्यादा कीमती हो” गलत है धारणा ये। अमूल्य वो, जिसकी कोई क़ीमत नहीं, न कम न ज़्यादा। वो सभी कीमतों से हट कर के है।
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दुर्बलता को पात्रता कहना ही भिक्षावृत्ति है

जो इंसान खुद भिखारी नहीं होगा, वो दूसरे भिखारियों के लिए भी दया की भावना नहीं रखेगा।
तो यह तो एक आपसी साजिश है, वो तो अपने ही समुदाय के बीच में है। जिसमें हमारा भ्रम है कि एक भिखारी है, और दूसरा दाता है। यह तो भिखारियों की आपसी मण्डली है, जिसमें एक दूसरे को थोड़े बहुत पैसे दिए जा रहे हैं। अभी चौराहे पर देते हैं, फिर गाड़ी लगा कर ऑफिस में जाकर हाथ फैला देंगे। तो कौन भिखारी है और कौन नहीं है?
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आओ, डूबो, बाकी सब भूलो

सारे धर्मो का परित्याग कर दो, धर्मो का परित्याग करो, धार्मिक हो जाओ। धर्मो को छोड़ो, धार्मिक हो जाओ। बात समझ में आ रही है? और धार्मिक वही हो सकता है, जिसने धर्मो को छोड़ दिया। ठीक वही बात यहाँ पर कह रहे है, कर्तव्यो को छोड़ो, और जो एकमात्र कर्तव्य है, जो तुम्हारा एकमात्र दायित्व है उसको पूरा करो, तुम्हारा एकमात्र दायित्व है? योग। मुझमें आकर मिल जाना, मुझमें लीन हो जाओ इसके अलावा तुम्हारा कोई कर्तव्य ही नहीं है।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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समर्पण माने क्या?

सागर मंथन हुआ, तो उसमें से बहुत सारा ज़हर निकला और ज़हर इतना कटु, इतना तीव्र था कि उसके होने मात्र से, प्रलय जैसी स्थिति आने लगी| विकराल ज़हर, बड़ी मात्रा में| तो समस्या उठी कि इस ज़हर का किया क्या जाए? देवताओं ने और दानवों ने मिल कर के सागर मंथन किया था| अब समस्या उठी कि इतना जो ज़हर निकल आया है, इसका किया क्या जाए? जब भी सागर मंथन होगा, उसमें से अमृत से पहले ज़हर निकलेगा| ये जो सागर है, ये हमारे मन का सूचक होता है| मन को जब भी मथोगे, उसमें अमृत आखिर में निकलेगा क्यूंकि आत्मा आखिरी है| पहले तो ज़हर ही निकलेगा, बिलकुल, हलाहल ज़हर| तो ज़हर निकला, इसका क्या किया जाए? बात पूरी सांकेतिक है, समझो| मन को मथा, ज़हर निकला, क्या किया जाए? कहीं तो इसको रखना पड़ेगा| जहाँ रखें, वहीँ खतरा क्यूंकि जहाँ रखो, वहीँ उस ज़हर से प्रलय आ जाएगी| अंततः वो उस ज़हर को लेकर के शिव के पास गए| शिव वो, जिसने उस ज़हर को पी लिया| कहा लाओ ठीक है|‘’ तुम लोग कुछ नहीं कर पा रहे, मुझे दे दो, मैं पी लूँगा|’’ पी लिया और ऐसा पिया कि, ‘’पी भी लूँ और मुझे कोई असर भी न हो|” तो वो जो पूरा ज़हर था, उसे अपने गले में रख लिया| तो वो नीलकंठ कहलाते हैं| ज़हर से उनका गला नीला हो गया|
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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स्वयं का विसर्जन ही महादान है

दान वो नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा, जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है, क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो और जिसको तुमने अपना आपा, अपना ‘मैं’, अपना स्वयं घोषित कर रखा है, वही तुम्हारा कष्ट है, वही तुम्हारा अहंकार है। वही तुम्हारे पाओं की बेड़ियाँ और अहंकार का बोझ है। जब तुम दान करते हो, तब तुम किसी और पर एहसान नहीं करते। जब तुम दान करते हो, तो अपने आप पर एहसान करते हो क्योंकि जो तुम दान कर रहे हो, वो वास्तव में तुम्हारी बीमारी है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जा रहा है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों को पढने का अद्भुत मौका व्यर्थ न जाने दें।

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उम्र के साथ उलझनें क्यों बढ़ती हैं?

बच्चे को बता दिया जाता है कि “तुझे कुछ और बन जाना है”।
बच्चे को बता दिया जाता है कि “जैसा तू है, अगर ऐसा रहा, तो दुनिया तुझे लूट खाएगी। चल, तू चालाक हो जा”।

तुम बच्चे जैसे ही रहो। तुम थोड़े भोले ही रह जाओ।

हो सकता है, उसमें थोड़े-बहुत तुम्हें नुकसान हों, पर झेल लो उन नुकसानों को। नुकसान तो होगा, पर जो तुम्हें मिलेगा, वो बहुत कीमती होगा। तो मिला-जुला कर, ख़ूब फ़ायदा ही फ़ायदा होना है।

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