खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।
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1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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क्रिया और कर्म के बीच अंतर

निष्काम कर्म वो, जिसमें कर्ता अनुपस्थित हो गया है। उसकी अनुपस्थिति मात्र प्रतीति नहीं है, तथ्य है।
ऐसा लग ही भर नहीं रहा है कि कोई कर्ता नहीं है, वास्तव में कोई कर्ता नहीं है क्योंकि जो कर्ता था, वो अपने ही स्रोत में मग्न हो गया है। अब जो घटना घट रही है, वो इसलिए नहीं घट रही कि उसका कोई फल अपेक्षित है। वो घटना बस घट रही है। अपेक्षाएं विलीन हो चुकी हैं, नहीं चाहिए आगे ले लिए कुछ। जो कर रहे हैं, उसी में आनंद है। जो हो रहा है, वो अपनेआप में पूर्ण आनंद ही है। वो अपनी आदि में भी आनंद है, और अपने अंत में भी आनंद है। माहौल ही आनंद का है। ये निष्काम कर्म हुआ।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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निष्ठा-किसके प्रति?

‘एक’ होना काफ़ी है; एक निष्ठ होना काफ़ी है। वो ‘एक’ कुछ भी हो सकता है, नाम से। वो नाम कुछ भी हो सकता है। इसीलिए, भारत में लाखों-करोड़ों इष्ट देवता रहे। क्या फ़र्क पड़ता है कि तुमने किसको अपना इष्ट बनाया? हाँ, इस बात से जरूर फ़र्क पड़ता है कि जिसको इष्ट बनाया, समर्पण पूरा रहे। मन उसके रंग में पूरा ही रंग जाए। फिर वहां पर दो फाड़ नहीं होना चाहिए, कि थोड़ा इधर और थोड़ा उधर। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सर किसके सामने झुका। पर जब झुके, तब पूरा ही झुक जाए। फिर उसमें आना-कानी नहीं होनी चाहिए। फिर उसमें कुछ बचा कर नहीं रखना। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुमने किस नदी में विसर्जित किया। बात यह है कि पूरा विसर्जित होना चाहिए। फिर यह न हो कि तुमने चुपके से कुछ बचा कर रख लिया।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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निजता वो अदृश्य रौशनी है जो सब कुछ दिखाती है

निजता यही है कि उसको जान लिया जो मेरा नहीं है। ये जानना ही निजी है। अविभक्तता यही है कि उसको जान लिया जो बाहर से आया है, ये जानना ही सब कुछ है। ध्यान रखिएगा लेकिन कि ये जानना, विचार करना नहीं है। इस जानने का अर्थ नहीं है कि आपने विचार करना शुरू कर दिया कि “मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समझ हूँ, मैं बोध हूँ, मैं इंटेलिजेंस हूँ।” ये विचार नहीं है, ये कोई भाव नहीं है, ये कोई इन्ट्यूशन नहीं है। ये सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, इसका होना न होने के बराबर है। ये आपके जीवन की एक एक तस्वीर को रंग देगा, लेकिन खुद कभी नजर नहीं आएगा। ये रौशनी की तरह है, जो सब कुछ दिखाती है पर खुद कभी नज़र नहीं आती।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998

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मन ही का विस्तार है संसार

हिमालय का होना और आप में स्पर्श की शक्ति का होना, एक ही बात है। और ऐसे प्राणी बिलकुल हैं और हो सकते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ आपसे हट कर हों। जिनके न आँख हो न कान हों, आप उन्हें जीवित नहीं मानोगे। आप कह दोगे जीवित ही नहीं हैं। क्यूँकी आपके लिए जीवन का अर्थ है ऐसे प्राणी, जिनमें इस प्रकार की इन्द्रियाँ हों। अरे! इसके पास वही सब इन्द्रियाँ हैं; कान भी हैं, आँख भी हैं, तो आप इसे जीवित मान लेते हो। आप पत्थर को जीवित नहीं मानते। बहुत दिनों तक पेड़ों को जीवित नहीं माना जाता था।
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कर्ताभाव कौन त्यागेगा, कर्ता स्वयं ही मूल झूठ है

जब बोध के द्वारा काम हो रहा है तो करने वाले कृष्ण होंगे क्योंकि कृष्ण बोधस्वरूप हैं, और जब आदतों, संस्कारों और परिस्तिथियों के द्वारा काम हो रहा है तो करने वाली माया हुई; और माया भी कृष्ण की। तो दोनों ही स्तिथियों में कर्ता कौन हुआ?
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Birth of the Infinity.
The wild playfulness of the Essence.
The madness of Love.
Brimming with mischiefs. Still, unmovable at the centre.

Meet K R I S H N A
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Discourse by Acharya Prashant
Day and Date: Wednesday, 24th August 2016.
Venue: 3rd Floor G-39, Sec-63, Noida, U.P
Near Fortis Hospital
Time: 06:30 p.m.
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These invaluable sessions are free of cost For any assistance or query contact
Mr.Joydeep Bhattacharya: 9650433495

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