मूर्तिपूजा का रहस्य || आचार्य प्रशांत, आत्मबोध पर (2019)

मूर्ति के पत्थर से तुम्हें कोई लाभ इसीलिये नहीं होता, क्योंकि तुमने मूर्ति का दुरुपयोग किया है।

मूर्ति थी ही इसीलिये, कि उसका प्रयोग तुम निराकार में प्रवेश के लिये करो। लेकिन हम मूर्ति से ही चिपककर रह गये।

तब संतों को हमें याद दिलाना पड़ा, कि मूर्ति पुल है, और पुल पर घर नहीं बनाते।

पुल को पार करते हैं। 

मूर्तिपूजा और विधियों का महत्व; भक्ति व ज्ञान में अंतर

तुम्हें क्या करना चाहिए, इसी का नाम उपाय है। उपाय, क्या है? इस क्षण में मेरे लिए क्या करणीय है। जो कुछ भी मेरे लिए अभी करणीय है, उसी का नाम उपाय है। उपाय, कोई विशेष रास्ता नहीं होता। प्रति क्षण परिस्थितियों को, तुम जो समुचित जवाब देते हो, जो समुचित प्रतिक्रिया देते हो, वही उपाय है। तुम्हारा जीवन, प्रति क्षण के कर्म, श्रद्धा से निकलें तो यही उपाय हो गया, परम को पाने का। और कोई विशेष उपाय नहीं चाहिए कि आधे घंटे के लिए ये करो, और आधे घंटे के लिए वो करो। और फलानी जगह पर चले जाओ, फलाने तीर्थ में नहा लो, कि हज कर आओ, न प्रतिदिन जो जीवन जी रहे हो, प्रतिक्षण जो विचार हैं, और जो कर्म हैं, वही तो उपाय है। तुम्हें क्या लगता है, कि तुम्हारी खबर सिर्फ उन दिनों में रखी जा रही है जिन दिनों में तुम तीर्थाटन कर रहे हो? या तुम्हारा हिसाब किताब उस सिर्फ समय देखा जा रहा है जब तुम मंदिर में या प्रार्थना में या नमाज़ में मौजूद हो?

श्रद्धा अनवरत चले, प्रार्थना निरंतर रहे, यही उपाय है। उपाय कोई विशेष विधि नहीं होती है, जीवन ही उपाय है। तुम कैसा जीवन जी रहे हो, इसी का नाम उपाय है, यही विधि है। यही साधन है, यही तकनीक है।

आचार्य प्रशांत
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