संचय और डर

हम क्यों इकट्ठा करना चाहते हैं, जानते हो?

हमें लगता है कोई अनहोनी घट जाएगी कल| आगे पता नहीं क्या हो तो पहले से इंतज़ाम करके रख लो|

दुनिया में और कोई भी नहीं है जो इतना डरा हुआ हो| अस्तित्व में कोई भी इतना ज़्यादा खौफ़ज़दा है ही नहीं जितना इंसान है| सब को भरोसा है; सबको एक आंतरिक भरोसा है कि “जो भी होगा चल जायेगा काम”| उन्हें सोचने की जरूरत ही नही पड़ती |

आनंद क्या है?

आनंद मन की वो स्थिति है, जिसमें वो अपनी ही मौज में है। ऐसा नहीं है कि उसे दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं है। वो दुनिया में काम कर रहा है, दुनिया में रह रहा है, दुनिया में परिणाम भी आ रहे हैं, पर वो उन परिणामों को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा है। वो उन परिणामों को मन में गहरे नहीं उतर जाने दे रहा। वो कह रहा है, “परिणाम हैं, ठीक है। जीते, बहुत बढ़िया बात। हारे, तो भी ठीक”।

मोह भय में मरे, प्रेम चिंता न करे

इंसान की गहरी से गहरी प्यास होती है प्रेम की; वो जब मिलती नहीं है तो दिमाग बिल्कुल रुखा-सूखा और भ्रष्ट हो जाता है । प्रेम कल की परवाह नहीं करता, वो समझदार होता है, वो अच्छे से जानता है कि कल आज से ही निकलेगा । प्रेम कहता है आज में पूरी तरह से डूबो, आज अगर सुन्दर है तो कल की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं । ये प्रेम का अनिवार्य लक्षण है कि प्रेम आज में जियेगा ।

कल की फ़िक्र करेगा नहीं क्योंकि प्रेम बहुत समझदार है और वो अच्छे से जानता है कि जिसने आज को पूरा-पूरा जी लिया, पी लिया उसका कल अपनेआप ठीक रहेगा, बिना फ़िक्र किये । पर जहाँ प्रेम नहीं होता वहाँ आज की अवहेलना कर दी जाती है और कल की कल्पना की जाती है । आज की अवहेलना, कल की कल्पना ।

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