जब चाहो तब मुक्ति

आप किसी भी तल पर पहुँच गए हों, वहां से एक रास्ता हमेशा उपलब्ध होता है लौटने का, हमेशा। अन्यथा फिर वो भूलभुलैया नहीं है, फिर वो लीला नहीं हो सकती, फिर वो खेल नहीं हो सकता। खेल का तो अर्थ ही यही है: जिसमें अभी आपको थोड़ी सम्भावना दी गई है जीतने की, आप जीत सकते हो। ठीक है अभी आप हार रहे हो, लेकिन खेल अभी पूरा नहीं हुआ। जब तक खेल पूरा नहीं होता, तब तक जीतने की सम्भावना है, और फिर वो अभी खेल नहीं है। आप कितना भी फंसे हुए हो, आपके सामने रास्ता एक खुला होता है — बड़ी कृपा है — इसी को अनुकम्पा कहते हैं। भूलभुलैया के किसी भी तल पर जा कर के आप गिरे हो, कितनी भी आपने अपनी दुर्दशा कर ली है, लेकिन फिर भी मुक्ति का मार्ग कभी पूर्णतया बंद नहीं होता।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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न भाग्य, न कर्म, मात्र बोध है मर्म

आप जितने तनाव में होंगे, आपको उतनी ज़्यादा जरुरत पड़ेगी मनोरंजन की, मस्ती चीज़ ही दूसरी है। किस्मत कैसी भी हो, क्या हो सकता है एक ऐसा आदमी जो मस्त रहे? जो ऐसा हो सकता हो, वही असली आदमी है। जो कह रहा है, ‘’ठीक किस्मत कब हमारी थी लेकिन हम तो हमारे हैं ना। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, पाना-खोना इन सब में, हम तो मस्त हैं। बाहर-बाहर ये सब कुछ चलता रहता है, भीतर ये हमें स्पर्श भी नहीं कर जाता क्यूंकि भीतर, तो कुछ और है जो बैठा हुआ है। हमने भीतर की जगह खाली छोड़ी ही नहीं हैं किस्मत के लिए। किस्मत बड़ी ताकतवर है पर उसकी सारी ताकत हम पर बस बाहर-बाहर चलती है। किस्मत भी बाहरी और उसका ज़ोर भी हम पर बाहर-बाहर चलता है। भीतर तो हमारे कुछ और है, उस तक तो किस्मत की पहुँच ही नहीं है। किस्मत ‘उसे’ छू नहीं सकती, ‘वो’ किस्मत से कहीं ज़्यादा बड़ा, महत्वपूर्ण है।‘’ जानो उसको, पाओ उसको जो तुम्हें किस्मत ने नहीं दिया।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जिस दवा से मर्ज़ दूर हो रहा हो, उसे नमन करो और लेते रहो

उस मरीज़ की तरह मत रहो जिसे पता भी न चल रहा हो, कि दवाई काम कर रही है। एक व्यर्थ का खतरा आ सकता है—पता ही नहीं चला कि दवाई काम कर रही थी कि, दवाई में असावधानी कर बैठे। पता ही नहीं चला ये चीज़ इतना फायदा देना शुरू कर चुकी थी कि, इस चीज़ को हलके में ले बैठे। तुम्हें लाभ हो रहा है। उसके लक्षण, उसके प्रमाण सब उठ-उठ के सामने आ रहे है।

अब बस चलते रहो।

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शान्ति कैसे पाएँ?

तुमने जो भी कुछ इकट्ठा किया है दुनिया में आ के, जिसे तुम कहते हो जन्म लेना, उस जन्म के परांत, वो अगर तुम्हारे होने के भाव को ही नष्ट किए दे रहा हो, गंदा किए दे रहा हो, तो उसको लिए फिरने से क्या फ़ायदा?

और ये मत समझना कि दुनिया में शांति भी इकट्ठा की जा सकती है और अशांति भी इकट्ठा की जा सकती है तो तुमसे कोई चूक हो गयी है तो तुमने अशांति इकट्ठा कर ली है।

एक राज़ की बात कहता हूँ- दुनिया से सिर्फ़ अशांति ही इकट्ठा की जा सकती है।

तुमसे कोई चूक नहीं हो गयी है। ये मत सोचना कि तुमने कुछ गलत निर्णय ले लिए। पहले तुम जिन चीज़ों से आकर्षित हो गए और जो तुमने संचित कर लिए, वो गलत थीं।

तुम जो भी कुछ इकट्ठा करोगे, वही तुम्हें अशांत करेगा।

आलस माने क्या?

आलस बड़ी चालाक चीज़ होती है | कोई भी फ़िज़ूल काम करने में तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | तुमने कभी गौर किया है कि तुम्हें आलस किन कामों में, किन चीजों में आता है?

आलस ऐसा नहीं है कि अँधा है | खूब आँखें हैं उसके पास, बड़ा शातिर है | खूब चुन-चुन के आता है आलस | कभी देखा है तुम्हें आलस किन-किन चीजों में आता है?

आलसी-वालसी नहीं हो तुम | तुम बड़े परिश्रमी हो | जहाँ पर तुम्हारे स्वार्थ सिद्ध हो रहे होते हैं वहाँ तुम्हें कभी आलस नहीं आयेगा | खूब दौड़ लगा लोगे |

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

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