मन को कैसे एकाग्र करें? || आचार्य प्रशांत (2017)

मुक्त अस्तित्व का न होना ही कष्ट है।

‘कमी है’ के भाव को जितना पोषण दोगे, उतना ज़्यादा मन मलिन होता जाएगा, धूमिल होता जाएगा।

मन सही लक्ष्य से भटक क्यों जाता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

अपनी हालत को गौर से देखो तो, चित्त भटकना बंद हो जाएगा।

फिर एक ही चीत्कार उठेगा – “आज़ादी, आज़ादी। और कुछ नहीं चाहिए, बस आज़ादी।”

जितने अँधेरे में तुम जिओगे, उतने तुम्हारे पास सपने होंगे।

ज़रा प्रकाश तो जलाओ।

हटाओ सपने, ज़िंदगी की हक़ीक़त देखो।

फिर बताना मुझे कि – क्या मन अभी-भी इधर-उधर विचलित होता है, भटकता है? 

मन को मुक्ति की ओर कैसे बढ़ाएँ? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

जब तुम अपनी वास्तविक इच्छा के प्रति ज़रा सजग, ज़रा संवेदनशील होते हो, तब तुम मुक्ति की ओर मुड़ते हो। 

दुःख से बड़ा मित्र तुम्हारा कोई नहीं।

भला हो कि तुममें दुःख के प्रति संवेदनशीलता बढ़े, तुम जान पाओ कि आम आदमी – तुम, मैं, सभी – कितने दुःख में जीते हैं।

जैसे-जैसे दुःख का एहसास सघन होता जाएगा,वैसे-वैसे मुक्ति की अभीप्सा प्रबल होती जाएगी।

तुम्हारी मुक्ति से बड़ा कुछ नहीं || आचार्य प्रशांत (2019)

‘मुक्ति’ समझते हो क्या है?

कल्पना से मुक्ति।

जानने वाले सौ बार समझा गए  – अकथ्य है, अचिंत्य है, अतुल्य है, असंख्य है।

अनंत है।

और तुम उसे नाप रहे हो।

किसने बाँध रखा है तुम्हें? || आचार्य प्रशांत (2019)

सब बंधे हुए हैं, और सबको मुक्ति चाहिए।

मुक्ति मिलती इसीलिए नहीं है, क्योंकि हम अपने बंधनों को ही लेकर ईमानदार नहीं होते।  

हम साफ़-साफ़ स्वीकारते ही नहीं हैं कि बंधन वास्तव में क्या हैं, क्या नाम है उनका, क्या स्वरुप है।

जब हम बंधनों को लेकर ही स्वयं से झूठ बोलते रहते हैं, तो फ़िर हमें सच्चाई कहाँ से मिलेगी, मुक्ति कहाँ से मिलेगी।

शराब से मुक्ति || आचार्य प्रशांत (2019)

‘मुक्ति’ तब है, जब उसके बचकानेपन को, उसकी व्यर्थता को देख लो।

उसका पक्ष लेना छोड़ दो, उसे गंभीरता से लेना छोड़ दो।

उसकी उपेक्षा करने लग जाओ।

कौन है ‘वो’ जिसकी हम बात कर रहे हैं?

वो, वो है, जिसे हम  ‘मैं’ बोलते हैं।

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