झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन

‘अपना’ आप किसको बोल रहे हो? जब तक आप शरीर से जुड़े रिश्तों को ‘अपना’ बोल रहे हो, तब तक आप ये कह रहे हो कि मेरा ‘अपना’ शरीर ही तो है। अगर शरीर से जुड़े रिश्तों में अपनापा है, तो आपका ‘अपना’ क्या हुआ सर्वप्रथम? शरीर।

तो फ़िर आपकी परिभाषा क्या हुई:

मैं कौन?

मैं ‘देह’!

और अगर आप देह हो, तो आप कष्ट से बच सकते कैसे हो?

विवेक का अर्थ

मन का एक होना वो है, मन की एक सामग्री वो है, जो मन को उसके स्रोत से दूर करती है| और मन की एक

मन – दुश्मन भी, दोस्त भी

मन का एक होना वो है, मन की एक सामग्री वो है, जो मन को उसके स्रोत से दूर करती है| और मन की एक दूसरी सामग्री वो है जो उसको स्रोत के निकट लेकर जाती है| ये आपके सामने कुछ पन्ने हैं, किताबें हैं |तो एक किताब हो सकती है जो मन को बहकाए और एक किताब हो सकती है जो मन को साध दे| स्रोत के पास ले जाए| हैं दोनों किताबें ही| हैं दोनों शब्द ही, किसी और का कहा हुआ शब्द है| दोनों ही किसी और के कहे हुए शब्द हैं| दोनो में ही कोई दूसरा मौजूद है| और दोनों की मौजूदगी में ही ज़मीन आसमान का अंतर है| एक है, जो आपको आपके करीब ले जा रहा है और एक है जो आपको आपसे ही दूर लेकर के जा रहा है और यही सूत्र है जीने का| यही कला है जीने की| कि क्या चुनें और क्या न चुनें| इसी का नाम विवेक है|
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

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निजता वो अदृश्य रौशनी है जो सब कुछ दिखाती है

निजता यही है कि उसको जान लिया जो मेरा नहीं है। ये जानना ही निजी है। अविभक्तता यही है कि उसको जान लिया जो बाहर से आया है, ये जानना ही सब कुछ है। ध्यान रखिएगा लेकिन कि ये जानना, विचार करना नहीं है। इस जानने का अर्थ नहीं है कि आपने विचार करना शुरू कर दिया कि “मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समझ हूँ, मैं बोध हूँ, मैं इंटेलिजेंस हूँ।” ये विचार नहीं है, ये कोई भाव नहीं है, ये कोई इन्ट्यूशन नहीं है। ये सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, इसका होना न होने के बराबर है। ये आपके जीवन की एक एक तस्वीर को रंग देगा, लेकिन खुद कभी नजर नहीं आएगा। ये रौशनी की तरह है, जो सब कुछ दिखाती है पर खुद कभी नज़र नहीं आती।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

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श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

पशुओं पर दया नहीं, उनसे मित्रता

अक्सर जब हम बोलते हैं, ”पशुओं पर दया करो तो हम बड़े कृपालु भाव से बोलते हैं।” बड़ा उसमें अहंकार होता है कि दया करो। अपने पर दया कर लो, पशु को तुम्हारी दया की नहीं, दोस्ती की ज़रुरत है।

दोस्ती कर सकते हो तो करो और दोस्ती में दोनों बराबर होंगे।

दोस्ती में यह नहीं होगा कि ”मैं ऊपर हूँ और पशु नीचे है।’’ तो उस भ्रम से भी बचना है। गाय को रोटी दे रहे हो, क्यों दे रहे हो? गाय पर दया कर के?

गाय पर दोस्ती करके दे रहे हो तो अलग बात है पर अगर गाय पर दया करके दे रहे हो तो देख लेना फिर गड़बड़ ही हो रही है। दोस्ती बिलकुल दूसरी चीज़ है। दोस्ती और प्रेम बिलकुल आस पास की चीज़ें हैं।

जानवर को इंसान मत बनाओ

अक्सर जब हम बोलते हैं, ”पशुओं पर दया करो तो हम बड़े कृपालु भाव से बोलते हैं।” बड़ा उसमें अहंकार होता है कि दया करो। अपने पर दया कर लो, पशु को तुम्हारी दया की नहीं, दोस्ती की ज़रुरत है। दोस्ती कर सकते हो तो करो और दोस्ती में दोनों बराबर होंगे। दोस्ती में यह नहीं होगा कि ”मैं ऊपर हूँ और पशु नीचे है।’’ तो उस भ्रम से भी बचना है। गाय को रोटी दे रहे हो, क्यों दे रहे हो? गाय पर दया कर के? गाय पर दोस्ती करके दे रहे हो तो अलग बात है पर अगर गाय पर दया करके दे रहे हो तो देख लेना फिर गड़बड़ ही हो रही है। दोस्ती बिलकुल दूसरी चीज़ है। दोस्ती और प्रेम बिलकुल आस पास की चीज़ें हैं।
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