जीत में जीते नहीं, न हार में हारे

जो उचित है, वो करो । नतीज़ा क्या आता है, छोड़ो । क्योंकि कोई भी नतीजा आखिरी कब हुआ है? तो नतीजे को नतीजा कहना ही बड़ी बेवकूफी है । कभी कहीं जाकर के कहानी रूकती हो तो तुम बोलो ‘द एंड’ । जब कहानी कहीं रूकती ही नहीं तुम क्यों कहते हो कि कहानी का नतीजा यह निकला । अनंत कहानी है, तो कैसे पता कि चूक गये?

प्रयत्न किसके लिए?

यत्न में हम सब उद्यत रहते हैं। हमारे सारे यत्न भूलने से उपजते हैं। विस्मृत कर देते हैं कि हम हैं कौन, क्या हमारा स्वभाव है और क्या हमें उपलब्ध ही है। ज्यों ये भूले कि मैं कौन और क्या मुझे मिला ही हुआ है, त्यों ही ये हसरत जगती है कि उसको हासिल करूँ जो खोया-खोया सा लगता है।

खोने और भूलने में फर्क है। तुम बिना खोये भी ये भूल सकते हो कि कुछ तुम्हारे पास है। तुम अपनेआप को खोये बिना भी अपनी पहचान बिल्कुल भूल सकते हो और भूलने का तुरंत परिणाम होता है- खोजने की कोशिश। “खो गया है – खोजो। मिट गया है – हासिल करो।”

तो यत्न में हम रत रहते हैं। भूलने का परिणाम है, यत्न। भूले, और हासिल करने निकल पड़े। ये हमारा आम संसारी है, जो हासिल करने की दौड़ में लगा हुआ है।

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

1 2 3 4 18