योग का क्या अर्थ है?

योग के लिए कुछ पाना नहीं है। जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है- आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यूँ? क्यूँकी पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है। ठीक? आप योगी नहीं हो सकते। योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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भोग-प्रौद्योगिकी, महाविनाश

विवेक का अर्थ क्या होता है?

विवेक का अर्थ होता है – कहाँ तक जाना है और कहाँ तक नहीं जाना है।

समय आ गया है जब इंसान को अपनी सीमा निर्धारित करनी होगी।

‘इतना ही चाहिए, इससे ज़्यादा नहीं चाहिए मुझे’।

मैंने ऐसा कब कहा?

जो अभी हो रहा है उसी को वर्तमान बोलते हो न, या वर्तमान कुछ और है? वर्तमान में ध्यान हो सकता है, आनंद हो सकता है, पर ख़ुशी तो भोग से सम्बन्धित होती है। वो तो हमेशा काल्पनिक है। वो तो तुम तय करके रखते हो कि ये हो जाए तो खुश हो जाएं। जिस दिन तुम वाकई ख़ुश हो गए, उस दिन तुम्हारी यात्रा रुक जायेगी। ख़ुशी का तो अर्थ ही यही है कि अभी और पाना है। जिसे तुम ख़ुशी बोलते हो, उस ख़ुशी के गहरे से गहरे क्षण में भी और ख़ुशी की इच्छा बनी ही रहती है। तुम कभी तृप्त कहाँ होते हो। वर्तमान में खुश होने का कोई अर्थ ही नहीं है क्योंकि ख़ुशी तो हमेशा ही कहती है कि अभी और मिले। और ये “और” कहाँ है? भविष्य में है। तो वर्तमान में तुम खुश हो कहाँ पाते हो?

वर्तमान में कोई ख़ुशी नहीं है। ख़ुशी का अर्थ ही है कि भविष्य में अभी और मिलेगा।

गरीब वो है जिसे अभी और चाहिए

सम्मुख सदा सत्य होता है; विमुखता का अर्थ है सत्य को पीठ दिखा देना – यही माया है।

जो सम्मुख है, जो सामने है, जो प्रत्यक्ष है, वो लगातार है और माया का काम ही यही है कि जो सम्मुख है उससे भागो, इसी का नाम विमुखता है।

जो सम्मुख है, उसी से भागना ही विमुखता है।

प्रकृति के तीन गुण

ज्ञान वो है जो अज्ञान को काटे।
पर ज्ञान के साथ दूषण ये होता है कि वो अज्ञान को तो काट देता है, लेकिन स्वयं बच जाता है।
गुणातीत होने का अर्थ है कि अज्ञान नहीं रहा, और अज्ञान के बाद अब ज्ञान भी नहीं रहा। अब तो शान्त बोध है।
उसी शान्त, खाली बोध को साक्षित्व कहते है।

मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट

मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो,
जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों।

जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों,
विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के,
तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो।

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