अपने सपनों का अर्थ जानो

तुम फँस गए हो, और माया किसी की भी शक्ल लेकर आ सकती है। क्यों सोचते हो कि माया किसी कामिनी स्त्री की ही शक्ल लेकर आएगी। माया एक छोटे से बच्चे की शक्ल लेकर भी आ सकती है, आती ही है। समझ क्यों नहीं पा रहे हो?

जिसकी जहाँ आसक्ति, माया वैसी ही शक्ल ले लेगी।
कोई क्यों सोचता है कि माया बहुत सारे सोने की, बहुत सारे पैसे की या कामेच्छा की ही शक्ल लेकर आएगी। माया, ममता की शक्ल लेकर बैठी हुई है। माया, कर्तव्य की शक्ल लेकर बैठी हुई है। लिफ़ाफ़े को फाड़ कर जब देखोगे, तो भीतर असली बात पता चलेगी।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

निष्ठा-किसके प्रति?

‘एक’ होना काफ़ी है; एक निष्ठ होना काफ़ी है। वो ‘एक’ कुछ भी हो सकता है, नाम से। वो नाम कुछ भी हो सकता है। इसीलिए, भारत में लाखों-करोड़ों इष्ट देवता रहे। क्या फ़र्क पड़ता है कि तुमने किसको अपना इष्ट बनाया? हाँ, इस बात से जरूर फ़र्क पड़ता है कि जिसको इष्ट बनाया, समर्पण पूरा रहे। मन उसके रंग में पूरा ही रंग जाए। फिर वहां पर दो फाड़ नहीं होना चाहिए, कि थोड़ा इधर और थोड़ा उधर। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सर किसके सामने झुका। पर जब झुके, तब पूरा ही झुक जाए। फिर उसमें आना-कानी नहीं होनी चाहिए। फिर उसमें कुछ बचा कर नहीं रखना। फ़र्क नहीं पड़ता कि तुमने किस नदी में विसर्जित किया। बात यह है कि पूरा विसर्जित होना चाहिए। फिर यह न हो कि तुमने चुपके से कुछ बचा कर रख लिया।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
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श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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पारिवारिक माहौल से विचलित मन

प्रतिक्षण मन के सामने विकल्प ही विकल्प होते हैं। हम जान नहीं पाते क्योंकि हम ध्यान नहीं देते कि लगातार चुनाव की प्रक्रिया चल ही रही है। मन किस आधार पर चुनाव करता है?

मन इस आधार पर चुनाव करता है कि उसको क्या बता दिया गया है कि महत्त्वपूर्ण है।

तुम जो भी कुछ मन को बता दोगे कि महत्त्वपूर्ण है, मन उसी को आधार बना कर के निर्णय ले लेगा!
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने के और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को व्यर्थ न जाने दें।

तिथि: 24-27 मार्च
आवेदन हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जीव के लिए ही मृत्यु है

देह होने का अर्थ ही यही है कि समस्त जीवन का एक ही औचित्य रह जाएगा: मौत से बचना, क्यूंकि जीवन की निष्पत्ति मात्र मृत्यु ही है देह के लिए। देह और कहीं को जा ही नहीं रहा, देह सिर्फ़ मौत की ओर जा रहा है और आप मरना नहीं चाहते। अब आप जो कुछ भी करोगे, आप की सांस-सांस में सिर्फ़ मौत का भय होगा। आप अपने आस-पास के संसार को देखिए, उनकी गतिविधियों को देखिए, आप पाएँगे कि सब कुछ सिर्फ़ मौत के भय से चालित है; आप दुनिया के विस्तार को देखिए, आपको उसमें सिर्फ़ मौत का विस्तार दिखाई देगा।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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समर्पण माने क्या?

सागर मंथन हुआ, तो उसमें से बहुत सारा ज़हर निकला और ज़हर इतना कटु, इतना तीव्र था कि उसके होने मात्र से, प्रलय जैसी स्थिति आने लगी| विकराल ज़हर, बड़ी मात्रा में| तो समस्या उठी कि इस ज़हर का किया क्या जाए? देवताओं ने और दानवों ने मिल कर के सागर मंथन किया था| अब समस्या उठी कि इतना जो ज़हर निकल आया है, इसका किया क्या जाए? जब भी सागर मंथन होगा, उसमें से अमृत से पहले ज़हर निकलेगा| ये जो सागर है, ये हमारे मन का सूचक होता है| मन को जब भी मथोगे, उसमें अमृत आखिर में निकलेगा क्यूंकि आत्मा आखिरी है| पहले तो ज़हर ही निकलेगा, बिलकुल, हलाहल ज़हर| तो ज़हर निकला, इसका क्या किया जाए? बात पूरी सांकेतिक है, समझो| मन को मथा, ज़हर निकला, क्या किया जाए? कहीं तो इसको रखना पड़ेगा| जहाँ रखें, वहीँ खतरा क्यूंकि जहाँ रखो, वहीँ उस ज़हर से प्रलय आ जाएगी| अंततः वो उस ज़हर को लेकर के शिव के पास गए| शिव वो, जिसने उस ज़हर को पी लिया| कहा लाओ ठीक है|‘’ तुम लोग कुछ नहीं कर पा रहे, मुझे दे दो, मैं पी लूँगा|’’ पी लिया और ऐसा पिया कि, ‘’पी भी लूँ और मुझे कोई असर भी न हो|” तो वो जो पूरा ज़हर था, उसे अपने गले में रख लिया| तो वो नीलकंठ कहलाते हैं| ज़हर से उनका गला नीला हो गया|
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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