बाहर काम अंदर आराम

अब मैं आपसे फिर कह रहा हूँ कि जिसने केंद्र में विश्राम को पा लिया, वो बाहर बड़े तूफ़ान खड़े करेगा और अगर आपकी जिंदगी में सिर्फ़ उदासी है और बोरियत है, गति नहीं है, त्वरा नहीं है, उर्जा नहीं है, बुझा-बुझा सा जीवन है, चार कदम चलने में आप थक जाते हैं, तो उसका कारण बस एक जानिए – आपके भीतर वो अस्पर्शित बिंदु नहीं है। जिसका केंद्र जितना अनछुआ रहेगा, वो परिधि पर उतना ही गतिमान रहेगा। आप अगर पाते हैं कि आपके जीवन में गति नहीं है, तो जान लीजिये कि गड़बड़ कहाँ हो रही है।

एक बुद्ध जब शांत हो जाता है, तो जीवन भर चलता है फिर, क्षण भर को बैठ नहीं जाता। समूचे उत्तर भारत पर छा गया था वो, तूफ़ान बन के। पुरानी रूढ़ियों को, सड़ी गली परम्पराओं को उठा फैंका था। यह तूफ़ान उस शांति से उपजा था, जो बुद्ध को उपलब्ध हुई थी।
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जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है

जो समय में जीता है, उसके ऊपर समय का प्रभाव पड़ता है। आपके पास ऐसा जो कुछ है, जो समय से आया है, उस पर समय का असर ही पड़ेगा। वो कर्मफल के सिद्धांत के भीतर ही चलेगा। शरीर आपको समय ने दिया है, तो शरीर पर समय का असर पड़ेगा। शरीर की उम्र बढ़ेगी, परिपक्व होगा, फिर ज़रा जीर्ण होगा और अंततः मृत्यु को प्राप्त होगा। कोई ये चाहे भी कि शरीर समय के पार हो जाए, तो ये हो नहीं सकता है क्योंकि शरीर ही समय है, समय का उत्पाद है। मन भी आपको समय ने दिया है। आपके मन में अभी जो विचार हैं, और विचारों के नीचे जो वृत्तियाँ हैं ये और कहाँ से आई? सब संसार की देन है। संसार माने समय, संसार और समय अलग-अलग नहीं हैं।
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क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार

जब जो होता है उससे तुम राज़ी हो जाते हो, तो तुम्हें फिर वो मिल जाता है, जो तुम्हारे राज़ी होने से आगे की बात है। परमात्मा कहता है कि जब तुझे वो ही पसंद नहीं, जो मैंने तुझे दिया, तो तुझे देने वाला कैसे पसंद आ जाएगा? जो भी उसने तुम्हें दिया है, भले ही उसने तुम्हें बदबू दी है, तुम पहले उसका सहज स्वीकार करो। फिर जिसने दिया है, वो भी तुम्हें मिल जाएगा। मैं तुम्हें कोई उपहार दूँ, तुम्हें वही पसंद नहीं आ रहा, तो तुम्हें देने वाला कैसे पसंद आएगा? तुम जो भी हो, जैसे भी हो, तुम्हें वही मिला है। उसके साथ शान्ति रखो। स्वीकार रखो। वही मिला है तुम्हें।

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मन की उचित दशा क्या?

सारे जो खंड हैं मन के, वो उठते-बैठते रहते हैं, वो केवल वस्तुओं से आसक्त हैं, और वस्तुएं बदलती रहती हैं समय के साथ, स्थान के साथ, पर मन का ‘वो’ एक बिंदु अचल है। उसको तो एक ही दिशा जाना है और वो एकटक देखे जा रहा है। मन का बाकी माहौल कितना बदलता रहे, वो एक है अकेला, जो उधर को ही देख रहा है। जैसे कि एक कमरे में बहुत सारे बच्चे मौजूद हों, और उस कमरे में खेलने के हज़ार खिलौने रखें हैं, और मिठाइयाँ रखी हैं, और मनोरंजन के उपकरण रखे हैं, और बहुत सारे बच्चे हैं, जो उनमें मगन हो गए हैं। कोई बच्चा, कोई खिलौना उठा रहा है और हज़ार खिलौने, और हज़ार मिठाइयाँ रखी हैं। पर एक बच्चा है, जो लगातार खिड़की से बाहर को देख रहा है कि माँ कहाँ है। उसे कमरे के भीतर का कुछ चाहिये ही नहीं। और बच्चों के हाथ के खिलौने, और मिठाइयाँ और डब्बे बदल रहे हैं, वो एक दिशा से दूसरी दिशा भाग रहे हैं, कभी ये उठाते हैं, कभी वो उठाते हैं, पर ये बच्चा एकटक बस खिड़की से बाहर देख रहा है- ‘माँ के पास जाना है’। नानक कह रहे हैं, तुम इस बच्चे के साथ हो लो।
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जो वचन आपसे न आए, वही मीठा है

जो स्वयं शीतल है, मात्र वही दूसरों को शीतलता दे सकता है। जब तक तुम शीतल नहीं, तब तक तुम दुनिया को मात्र जलन ही दोगे। तपता हुआ लोहा अगर किसी को स्पर्श करे, तो उसे शीतल थोड़े ही कर देगा।

हम सब जलते हुए पिंड हैं, हमारा होना ही जलन है हमारी। हमारा अहंकार ही जलन है हमारी, हम जहाँ से निकल जाते हैं, वहां आंच फैला देते हैं ।
कभी गौर किया है आपने कि आपके होने भर का, आपके माहौल पर क्या प्रभाव पड़ता है ? हम में से अधिकांश ऐसे हैं कि किसी शांत जगह पर पहुँच जाएँ, तो जगह पूरी कम्पित हो जाए, जैसे भूचाल। कभी आप कहीं मौन बैठे हों, तो फिर आपकी नज़र में आया हो, कि एक विक्षिप्त मन आता है, और ऐसे उसके कदम होते हैं, ऐसे उसके वचन होते हैं, ऐसा उसका होना होता है कि उसको पता भी नहीं लगता कि उसने शांत झील में कैसी कैसी लहरें उठा दीं। जैसे साफ़ फर्श हो, और किसी के क़दमों में कीचड़ ही कीचड़ लगा हो, और वो ऐसा बेहोश कि वही अपने पैर ले कर के साफ़ सफ़ेद फर्श के ऊपर से निकल गया। उसे पता भी नहीं उसने क्या कर दिया। ऐसे हम होते हैं।

जिसके अपने पाँव गंदे हैं, वो कहीं क्या सफाई लाएगा ? उन्हीं क़दमों से चल के तो सफाई करने जाएगा, जहाँ जाएगा वहीं गन्दा करेगा। आप शीतल, तो दूसरे शीतल। आत्मार्थ ही परमार्थ है। अपनी मुक्ति के लिए ध्यानस्थ रहो, यही परमार्थ है।
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समर्पण का वास्तविक अर्थ

घुटने टेकने का नाम नहीं है समर्पण, हारने का नाम नहीं है समर्पण, कमज़ोर हो जाने का नाम नहीं है समर्पण। समर्पण का अर्थ है, ‘’मैंने अपनी कमज़ोरी को समर्पित किया; अब मैं मात्र बल हूँ।’’ समर्पण का अर्थ होता है: असीम ताकत।
समर्पण का अर्थ ये नहीं होता कि, ‘’मैं छोटा हूँ, नालायक हूँ, बेवकूफ़ हूँ।’’ समर्पण का अर्थ होता है कि, ‘‘मेरे भीतर जो नालायकी थी, मेरे भीतर जो क्षुद्रता थी, मैं जो पूरा का पूरा ही कमजोरियों का पिंड था; मैंने इसको छोड़ा, मैंने इसे समर्पित किया।’’ यह होता है समर्पण। समर्पण का ये अर्थ मत समझ लेना कि कहीं जा कर के अपनेआप को प्रस्तुत कर देने का नाम समर्पण है, परिस्थितियों की चुनौती का जवाब न दे पाने का नाम समर्पण है, जीवन से हारे-हारे रहने का नाम समर्पण है। ये सब समर्पण नहीं है, ये तो कमजोरियाँ हैं, बेवकूफ़ियाँ हैं।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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