सपनों में गुरुदर्शन का क्या महत्व है? || आचार्य प्रशांत (2019)

इतना भी आसान नहीं होता है।

ये तो बहुत ही दूर की बात है कि गुरु के कहे को गह लिया, समझ लिया, या गुरु के समक्ष नतमस्तक हो गये।

ये तो बहुत-बहुत आगे की बात है।

मन के लिये इतना भी आसान नहीं होता कि वो मान ले कि मन के आगे, मन से बड़ा, मन के अतीत, मन के परे भी कुछ होता है।

किसी को सभी मूर्ख बनाते हों तो? || आचार्य प्रशांत (2018)

तो बात हिम्मत की नहीं है, कि वो उनसे डर गए इसीलिए उनके निकट नहीं गए।

वो उनके निकट इसीलिए नहीं जाएँगे, क्योंकि वो उनको समझदार देखेंगे, होशियार देखेंगे।

वो उनके निकट इसीलिए नहीं जाएँगे, क्योंकि उनको पता है कि वहाँ उनका स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा।

उनको पता है कि उनके पास जाकर वो बेवक़ूफ़ नहीं बना पाएँगे।

तो उनके पास जाकर वो व्यर्थ की बात करेंगे ही नहीं।

ध्यान करने बैठते हैं तो मन भटकने क्यों लग जाता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

ऐसे ही तो करते हो न?

दिनभर जिसको खुद ही पालते हो, पोसते हो, ध्यान और अध्यात्म के ख़ास क्षणों में चाहते हो कि वो दूर ही दूर रहे।

ऐसा होगा?

मन पर चलना आज़ादी नहीं || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

कभी भी इस तर्क को महत्त्व मत देना कि – “भई, अपनी-अपनी मर्ज़ी होती है।”

अपनी मर्ज़ी, ‘अपनी’ होती ही नहीं।

लाखों में कोई एक होता है, जिसकी अपनी मर्ज़ी होती है।

ये बनना, बिगड़ना, और बदलते रहना || आचार्य प्रशांत (2017)

कोई दिन ऐसा नहीं था जब ये खेल चल नहीं रहा था,

और कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब ये खेल चल नहीं रहा होगा।

मिट्टी का सवाल है, मिट्टी में मिल जाना है।

जिसे नहीं मिलना मिट्टी में, वो सवाल कर ही नहीं रहा।

तो इतना नहीं आतुर होते, इतना नहीं भावाकुल होते।

मौज मनाईए।

बस यही है।

मन हल्का कैसे रहे? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

‘विश्राम’ का अर्थ है – तनाव फ़िज़ूल है। इससे वो मिलेगा नहीं जो चाहिए।

तनाव अपनेआप नहीं आता है। हम तनाव को पहले बुलाते हैं, और फिर उसे हम पकड़ के भी रखते हैं।

तनाव अपने पाँव चल कर नहीं आता, आमंत्रित किया जाता है, क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि तनाव से हमें कुछ मिल जाएगा।

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