अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ? || आचार्य प्रशांत (2019)

युद्ध में तो तुम हो ही।

कृष्ण की सुनने लग जाओ, तो ‘अर्जुन’ कहलाओगे।

कृष्ण की नहीं सुनोगे, तो मारे जाओगे।

सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम बड़े बेईमान पखेरू हो।

तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के हो।

ऐसा भी नहीं कि राम के प्रति तुम्हारी बेईमानी है, तो संसार के प्रति तुम्हारी ईमानदारी है।

तुम दुनिया के भी नहीं हो।

कालातीत योग और समकालीन चुनौतियाँ || आचार्य प्रशांत, योग पर (2018)

व्हाट्सएप पर नियमित अपडेट पाने हेतु यहाँ क्लिक करें आचार्य प्रशांत जी: प्रश्न यह है कि योग तो कालातीत है, पर उसके सामने समकालीन चुनौतियाँ

धन की क्या महत्ता है? || आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2018)

धन अकस्मात नहीं आ जाता। हाथ का मैल नहीं होता वो, भले ही हमारा प्रचलित मुहावरा ऐसा कहता हो।

धन आता है, उसके पास, जो दुनिया को समझता है।

धन कमाना एक कला है, जो माँग करती है कि आपने जगत के दाँव-पेंचों की समझ हो।

जो दुनिया को नहीं जानता, वो दुनिया में धन नहीं कमा सकता।

और ‘दुनिया को जानने’ का अर्थ होता है – मन को जानना।

श्रद्धा क्या है? आत्मविश्वास से श्रद्धा का क्या संबंध है? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

तुम्हें पता होना चाहिये कि तुम्हारा हित कहाँ है।

तुम्हें दिखना चाहिये कि ये चिकित्सक तुम्हारे साथ जो कुछ भी कर रहा है, उसी में तुम्हारा फायदा है। और अगर तुम भागोगे, तो नुकसान अपना ही करोगे।

यही चीज़ तुमको अडिग रख सकती है, गुरु के पास।

और कुछ नहीं।

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