कचरे से मोह छोड़ना है वैराग्य; निरंतर सफाई है अभ्यास

अभ्यास का अर्थ है – ‘उस केंद्र से लगातार जुड़े रहना जिस केंद्र के परितः ये पूरी लीला चल रही है’।लीला से सम्प्रक्त नहीं हो जाना।केंद्र से जुड़े रहना, यही अभ्यास है।और ‘लीला से हटे रहने’ का नाम ‘वैराग्य’ है।लीला से हटे रहने का अर्थ ये नहीं है कि लीला जब चल रही हो, तब भाग गए, ‘लीला को लीला जानना ही वैराग्य है’।बस ‘जाने’ हुए हो, उसमें तुम्हें शामिल तो होना ही पड़ेगा।शरीर यदि है, और जिस हद तक तुम शरीर हो, उस हद तक लीला से तुम्हारी कोई भिन्नता नहीं हो सकती।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com
या
संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

पारिवारिक माहौल से विचलित मन

प्रतिक्षण मन के सामने विकल्प ही विकल्प होते हैं। हम जान नहीं पाते क्योंकि हम ध्यान नहीं देते कि लगातार चुनाव की प्रक्रिया चल ही रही है। मन किस आधार पर चुनाव करता है?

मन इस आधार पर चुनाव करता है कि उसको क्या बता दिया गया है कि महत्त्वपूर्ण है।

तुम जो भी कुछ मन को बता दोगे कि महत्त्वपूर्ण है, मन उसी को आधार बना कर के निर्णय ले लेगा!
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने के और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को व्यर्थ न जाने दें।

तिथि: 24-27 मार्च
आवेदन हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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आनंदित कैसे रहें?

इंसान अकेला है जिसे ये भ्रम रहता है कि कुछ करके आनंद मिल जाएगा| यही रहता है ना तुमको कि ऐसा क्या करें कि आनंद उपलब्ध हो जाए| यही सवाल पूछते हो ना? ये सवाल ही मूलतः गलत है| जो तुम्हारे पास है नहीं, वो कुछ कर के हासिल नहीं हो सकता| कर-कर के जो हासिल होता है वो सब वही हैं, जो तुम्हारे मन की ही उपज हैं| कोई मटेरियल हो, वो हासिल हो सकता है| कोई जगह होगी, वहाँ तक पहुँच सकते हो| पर आनंद, मुक्ति, प्रेम या सत्य, यह कुछ कर के हासिल करने वाली चीजे नहीं है| आनंद में रहा जाता है, चाहे कुछ कर रहे हो या नहीं कर रहे हो और आनंद की इस हालत में फिर तुम जो कुछ भी करो उस पर तुम्हारे आनदं का रंग चढ़ जाता है| तुम आनंदित हो, खा रहे हो, तो तुम्हारे खाने पर उस आनंद का रंग चढ़ जाता है| खाना साधारण होगा लेकिन तुम उसे आनंद में खा रहे होगे| खाने से तुम्हे आनंद नहीं मिल रहा है| तुम आनंदित हो इसलिए तुम्हें खाने में आनंद मिल रहा है|
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‘आएँ और प्रकाश से अनुग्रहीत हों’
आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में आएँ और प्रकाश का वास्तविक अर्थ जानें|

दिन एवं दिनांक: रविवार, 30अक्टूबर
समय: प्रातः 09 बजे से
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39,सेक्टर-63, नॉएडा
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

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