बंधन चाहने से बंधन मिलता है और मुक्ति चाहने से भी बंधन ही मिलता है

जो तुम्हारे सुन्दरतम सपने हैं, वो साकार हो भी गए, ईमानदारी से बताओ, संतुष्ट हो जाओगे? और ऐसा तो नहीं है कि कभी तुम्हारा कोई स्वप्न साकार हुआ नहीं है, कभी-कभी तो तुम्हारी चाहतें पूरी भी हुई हैं।
उनसे खिल गए तुम? उनसे भर गए तुम? उधर माने क्या? उधर माने स्वप्न, उधर माने चाहतों का, भविष्य का, हसरतों का संसार, उधर माने कल्पना। इन कल्पनाओं ने तुम्हें कोई पूर्ति दी है आज तक? दी है? नहीं दी है, तो अब कैसे दे देंगी? जो आज तक नहीं हुआ, क्यों उम्मीद कर रहे हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के चंद बचे हुए सालों में हो जाएगा?
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गुरु तुम्हें वो याद दिलाता है जो तुम जानते ही हो

श्रद्धा में और जिद्द में यही अंतर है। जिद्द घबराएगी, परेशान हो जाएगी और उसके ऊपर ज़्यादा दबाव डालोगे, तो टूट भी जाएगी। और श्रद्धा को तुम तोड़ नहीं सकते क्यूँकी वो है ही नहीं। तुम उसमें कुछ एसर्ट नहीं कर सकते। तो आप उसको तोड़ नहीं सकते। वो तो हारने को भी तैयार हो जाएगी। वो तब भी जीत जाएगी।

क्यूँकी कुछ क्लेम करने को नहीं है न ख़ास। कुछ सिद्ध करने को है नहीं। वो सारे रास्ते ले लेगी। वो बहते पानी की तरह है, वो इधर भी चल लेगी, वो उधर भी चल लेगी।
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जागरण का ताप ही वृत्तियाँ जला देगा

बच्चा नहीं पैदा होता, वृत्तियों का एक पुंज पैदा होता है। उसे जाना होता है, उसे ख़त्म होना होता है। कई लोग सोचते हैं कि व्रत, उपवास रखे ऋषियों ने, इससे उनको मुक्ति मिल गयी, मोक्ष मिल गया। बड़े-बड़े तपस्वी हुए हैं, जिन्होंने बड़ी तपस्या करीं हैं। महावीर का नाम आता है, बुद्ध का नाम आता है। शरीर गला दिया, हाड़ सुखा दिया। ये सब किसलिए था ज़रा समझो तो, मास गलाने से किसी को मुक्ति नहीं मिल जानी हैं। पर मांस गलाना एक प्रकार का मानसिक अभ्यास है। शरीर महत्व नहीं रखता, मन महत्व रखता है।
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सत्य और प्रेमिका में से किसे चुनूँ?

दुनिया में शान्ति सिर्फ़ एक तरीके से आ सकती है। वो तरीका तुम हो। तुम जितने मौन होते जाओगे, जितना तुम्हारे भीतर का शोर कम होता जाएगा, तुम पाओगे उतना ही बाहर के शोर को अब तुम कम पा रहे हो, बिना प्रयत्न किये। क्योंकि शोर तो गूँज की तरह होता है। उसे दीवार चाहिए। शोर कहीं से निकला, फिर उसे दीवार चाहिए, जो पलट करके उस शोर को वापिस ला दे। अगर खुले आकाश हो गए हो तुम, तो शोर फिर खो जाता है। तुम बंद कमरे में आवाजें करो, वहाँ शोर होता है। तुम खुले मैदान में आवाजें करो, तुम पते हो शोर कम होता है।
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अपनी निजता क्यों खो देते हो?

हमारे दिमाग ऐसे ही हैं। उन पर निशान बहुत जल्दी पड़ जाते हैं। जैसे कि एक धातु की पट्टी हो। उसको आप एक बार मोड़ दो और फिर छोड़ो। तो क्या होता है? तुमने एक लोहे की पट्टी ली और उसकी मोड़ दिया। फिर छोड़ोगे तो क्या होगा? वो वैसी ही रहेगी जैसा कर दिया है। ये कहलाती है दिमाग की प्लास्टिसिटी। एक बार मन पर एक प्रभाव पड़ गया, तो वो मन को गन्दा कर के जाएगा। वो मन पर एक तरीके का निशान छोड़ करके जाएगा। वो एक प्रभाव पर से गुज़रा और वो हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। हमेशा के लिए।
दूसरी ओर लचीला दिमाग होता है। वो एक स्वस्थ दिमाग होता है। जो प्रभावों से गुज़र जाता है लेकिन रहता साफ़ है। उस पर कोई निशान हमेशा के लिए पड़ नहीं पाता। उसकी कंडीशनिंग नहीं हो पाती।
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जो वचन आपसे न आए, वही मीठा है

जो स्वयं शीतल है, मात्र वही दूसरों को शीतलता दे सकता है। जब तक तुम शीतल नहीं, तब तक तुम दुनिया को मात्र जलन ही दोगे। तपता हुआ लोहा अगर किसी को स्पर्श करे, तो उसे शीतल थोड़े ही कर देगा।

हम सब जलते हुए पिंड हैं, हमारा होना ही जलन है हमारी। हमारा अहंकार ही जलन है हमारी, हम जहाँ से निकल जाते हैं, वहां आंच फैला देते हैं ।
कभी गौर किया है आपने कि आपके होने भर का, आपके माहौल पर क्या प्रभाव पड़ता है ? हम में से अधिकांश ऐसे हैं कि किसी शांत जगह पर पहुँच जाएँ, तो जगह पूरी कम्पित हो जाए, जैसे भूचाल। कभी आप कहीं मौन बैठे हों, तो फिर आपकी नज़र में आया हो, कि एक विक्षिप्त मन आता है, और ऐसे उसके कदम होते हैं, ऐसे उसके वचन होते हैं, ऐसा उसका होना होता है कि उसको पता भी नहीं लगता कि उसने शांत झील में कैसी कैसी लहरें उठा दीं। जैसे साफ़ फर्श हो, और किसी के क़दमों में कीचड़ ही कीचड़ लगा हो, और वो ऐसा बेहोश कि वही अपने पैर ले कर के साफ़ सफ़ेद फर्श के ऊपर से निकल गया। उसे पता भी नहीं उसने क्या कर दिया। ऐसे हम होते हैं।

जिसके अपने पाँव गंदे हैं, वो कहीं क्या सफाई लाएगा ? उन्हीं क़दमों से चल के तो सफाई करने जाएगा, जहाँ जाएगा वहीं गन्दा करेगा। आप शीतल, तो दूसरे शीतल। आत्मार्थ ही परमार्थ है। अपनी मुक्ति के लिए ध्यानस्थ रहो, यही परमार्थ है।
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