कदम-कदम पर तरीके मौजूद हैं तुमको क्षुद्रता में धकेलने के लिए|

बड़ी कम्पनियाँ बड़े ऑफिस बनाती हैं| और तुम्हारे भीतर हसरत जागती है कि मैं इन बड़े-बड़े ऑफिसों में काम करूँ| और तुम ये देख ही

कहीं भी मन क्यों नहीं लगता?

अपने आस-पास की दुनिया को देख लो या अपने ही मन को टटोल लो, तुम्हें यही दिखाई देगा कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं होती जिसमें मन लगा रह सके| कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होता| थोड़ी देर के लिए तुम्हें भ्रम ज़रूर हो जाएगा की मन लग गया है पर भ्रम टूटेगा| और जितनी बार वो भ्रम टूटेगा उतनी बार तुम भी टूटोगा|

मन लगेगा, दोहरा रहा हूँ, (लेकिन) किसी काम में नहीं लगेगा| हर काम में रहेगा| जहाँ हो, वहीँ लगेगा| तुम ऐसे आदमी की तरह हो जाओगे जिसका पेट भरा हुआ है, जिसका दिल भरा हुआ है, जो खूब मस्त है| अब वो जो भी करेगा, कैसा करेगा? मज़े में करेगा ना|

~आचार्य प्रशांत
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गलतियाँ और बदलाव

हजार चीजें तो चाहते ही हो न? जिस दिन तुम उसको ही चाहने लग जाओगे, काम हो जाएगा। जितने सवाल पूछ रहे हो, उन सारे सवालों का मूल सवाल ये है कि, “मैं चाहता भी हूँ क्या?” बातें तो बड़ी समझदारी की कर रहे हो, कोई जानना चाहता है बोध के बारे में, कोई प्यार के बारे में, कोई प्रभाव। कोई कुछ-कुछ। लेकिन सवालों का सवाल एक है। चाहते हो? चाहते हो जो, वो मिल जाएगा?

अगर पक्का-पक्का चाहने लगोगे कि वही मिल जाए, तो वो मिल जाएगा।लेकिन तुम चाह सकते नहीं जब तक वो न चाहे कि तुम चाहो।
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समझ हमेशा पूरी होती है

आप सिर्फ़ शोर के नामौजूदगी में जान सकते हैं। आप किसी चीज़ को नहीं समझते है, आप समझ में होते हैं। अब मन समझ में है और जब मन समझ में होता है, स्वतंत्र, तो वो बेचैन नहीं होता। तो सिर्फ़ वही देख के आप कह सकते हो कि सब कुछ सही होगा। बेचैनी के अभाव में ही, जागरूकता होती है। आपको कैसे पता कि आप जागरुक हैं? क्यूँकी आप बेचैन नहीं है।
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जो समय में है वो समय बर्बाद कर रहा है

जो समय में नहीं है, उसका समय ख़राब नहीं हो रहा। और जो समय में है, वो समय बर्बाद कर रहा है। जो ठीक अभी मौजूद है, समय में है, वो इस क्षण का ठीक अभी-अभी पूरा-पूरा सदुपयोग कर रहा है। और जो इस क्षण में नहीं है, जो समय में है, अतीत या भविष्य की कल्पनाओं में खोया हुआ है, वही है जो समय ख़राब कर रहा है।
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