दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे

मन वाणी का स्वामी रहे, विवेक मन का स्वामी रहे और विवेक आत्मा से उद्भूत हो और आत्मा से क्या अर्थ है? वही जो मेरा तत्त्व है, जो मेरा मूल तत्त्व है। सब कुछ उससे जुड़ा हुआ रहे, वही स्रोत रूप रहे। मन स्रोत में समाया हुआ है, मन स्रोत में समाया हुआ रहे। यही जब मन स्रोत से अलग होता है उसी को फिर भक्ति वाणी विरह का नाम देते हैं। मन का स्रोत से अलग हो जाना ही विरह है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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अपने सपनों का अर्थ जानो

तुम फँस गए हो, और माया किसी की भी शक्ल लेकर आ सकती है। क्यों सोचते हो कि माया किसी कामिनी स्त्री की ही शक्ल लेकर आएगी। माया एक छोटे से बच्चे की शक्ल लेकर भी आ सकती है, आती ही है। समझ क्यों नहीं पा रहे हो?

जिसकी जहाँ आसक्ति, माया वैसी ही शक्ल ले लेगी।
कोई क्यों सोचता है कि माया बहुत सारे सोने की, बहुत सारे पैसे की या कामेच्छा की ही शक्ल लेकर आएगी। माया, ममता की शक्ल लेकर बैठी हुई है। माया, कर्तव्य की शक्ल लेकर बैठी हुई है। लिफ़ाफ़े को फाड़ कर जब देखोगे, तो भीतर असली बात पता चलेगी।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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जीव के लिए ही मृत्यु है

देह होने का अर्थ ही यही है कि समस्त जीवन का एक ही औचित्य रह जाएगा: मौत से बचना, क्यूंकि जीवन की निष्पत्ति मात्र मृत्यु ही है देह के लिए। देह और कहीं को जा ही नहीं रहा, देह सिर्फ़ मौत की ओर जा रहा है और आप मरना नहीं चाहते। अब आप जो कुछ भी करोगे, आप की सांस-सांस में सिर्फ़ मौत का भय होगा। आप अपने आस-पास के संसार को देखिए, उनकी गतिविधियों को देखिए, आप पाएँगे कि सब कुछ सिर्फ़ मौत के भय से चालित है; आप दुनिया के विस्तार को देखिए, आपको उसमें सिर्फ़ मौत का विस्तार दिखाई देगा।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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सन्यास-मूर्खता से प्रतिरोध

पुरुष की अपूर्णता है कि, उसके अहंकार को ‘जीतना’ है। स्त्री की अपूर्णता है कि, उसके अहंकार को कब्ज़ा करके बैठना है। पुरुष का अहंकार उस राजा की तरह है, जो कभी अपनी राजधानी में पाया नहीं जाता क्यूंकि उसे और जीतना है। वो हमेशा अपनी सीमाओं को बढ़ाने के प्रयास में लगा रहता है। वो सोचता है कि कुछ है, जो बहुत दूर है और मैं अपनी सीमाओं को और बढ़ा करके उस तक पहुँच जाऊंगा। पुरुष को इसीलिए ‘और’ चाहिए। पुरुष का मन अक्सर एक स्त्री से भरेगा नहीं, उसको अपनी परिधि बढ़ानी है। उसको लग रहा है कि जो परम है, वो कहीं दूर बैठा हुआ है और उस तक पहुंचना है।

स्त्री का अहंकार सूक्ष्मतर है; एक कदम आगे है वो पुरुष से, उसे और नहीं चाहिए। इतना तो वो समझ गई है कि भाग-भाग के कुछ नहीं होगा, सीमा बढ़ाकर कुछ नहीं होगा, मिल यहीं जाएगा लेकिन इतना समझने के बावजूद डरती है कि यहाँ जो मिला हुआ है वो कभी भी छिन सकता है। तो वो कब्ज़ा करके बैठने चाहती है।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अंधी शिक्षा का नतीजा है हिंसा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें

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