गुरु वचन – अहंकार नाशी

बहुत तरह के संबंध होते हैं हमारे।

सबसे निचले तल पर शरीर से शरीर का संबंध होता ही है, और ध्यान से आप देखेंगे तो अधिकांशतः जो हमारे संबंध होते हैं वह इसी श्रेणी में आते हैं, शरीर से शरीर। शरीर का अर्थ है पदार्थ, जहाँ कहीं भी व्यक्ति पदार्थ भर है वहाँ संबंध शरीर से शरीर तक का है।

फ़िर आप उससे थोड़ा ऊपर उठते हैं, तो मन के संबंध बनने लग जाते है। यहाँ पर कम ध्यान दिया जाता है कि आप दिखते कैसे हो, यहाँ पर ध्यान इस पर चला जाता है कि आप सोचते कैसे हो। आपकी विचारणा कैसी है, आप किस विचारधारा से आ रहे हो, आपके मत कैसे हैं।

फ़िर एक संबंध होता है गुरु का और शिष्य का, प्रेम का संबंध, यह अपने आप में अकेला संबंध है जो न शरीर का है न मन का है, यह संबंध कहीं और का है। पर यह कहाँ का है यह आप कैसे जानोगे जबतक आपने अपने आप को शरीर और मन ही समझा है?

इसी कारण गुरु रहें आते हैं, पड़े रह जाते हैं, पूरा अस्तित्व ही गुरु है, गुरुओं की कोई कमी नहीं, लेकिन उनसे लाभ किसी को नहीं मिल पाता।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

गहरा प्रेम, गहरा विरोध

अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई। पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई; मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़  निभाईं। -बुल्ले

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