हम शरीर तक का तथ्य तो बर्दाश्त नहीं कर पाते, हम परम सत्य क्या बर्दाश्त करेंगे?

वैलेंटाइन डे मनाने की एक ही जगह हो सकती है, “मंदिर”, “मस्जिद”। जाओ, खड़े हो जाओ जीसस के सामने, और बोलो, “आई लव यू”, और

असली प्रेमी हो, तो प्रेमिका का अहंकार काटो

कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो तुम कृष्ण हुए। हमें तो कोई प्यारा लगता ही इसी शर्त पर है, कि उसका कुछ छिपा हुआ हो। नंगा शरीर तुम्हें उतनी उत्तेजना नहीं देता होगा, जितनी अधनंगा देता है। कभी गौर किया है? कृष्ण तुम तब हुए जब तुम्हें सब दिख जाए, पूर्ण नग्न, एक एक तथ्य जान गए जीवन का। सब खुला सा है। आँखें खुली हुई हैं, मन ध्यानरत है। और फिर कहते हो कि अब होगा रास। तब हुए तुम कृष्ण, ऐसे थोड़े ही कि प्रेम करने के लिए भी चीज़ें छुपा रहे हैं ।
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अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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प्रेम में तोहफ़े नहीं दिए जाते, स्वयं को दिया जाता है

जहाँ प्रेम होता है, वहाँ लुक्का-छुप्पी नहीं होती। ऐसा नहीं होता कि ये एक विशेष चीज़ है, तुम्हारी है। विशेष हो कि निर्विशेष हो, जैसे हैं तुम्हारे हैं और खबरदार अगर तुमने ठुकराया। और फिर यह भी नहीं होता कि साल में एक दिन लाए हैं खीर तुम्हारे लिए, फिर तो साल में जो भी बनेगा, जिस दिन भी बनेगा तुम्हारा ही है।
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1.) अद्वैत बोध शिविर
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श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है

ये मंदिर तो आपके मन का हिस्सा है। ये मंदिर तो आपकी पुरानी दुनिया को कायम रखने का तरीका है। आप जैसे हो, आपने मंदिर में वैसा ही देवता बैठा दिया है। जैसा आपका मन, वैसी देवता की मूरत। किसके सामने सर झुका रहे हो? जिस देवता की मूरत के सामने सर झुकाया जा रहा है, वो आदमी का अहंकार ही है, जो उसने, मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया है। कुछ बदला नहीं है, और मंदिर के आने से, कुछ बदल सकता भी नहीं है। ये वैसा ही होगा कि किसी को हल्का होना हो, उसने पांच अलग-अलग तरह के, बोझ उठा रखे हों। और वो कहे, ‘’एक छठा बोझ भी उठा लेना है, उससे शायद मैं हल्का हो जाऊं।’’ छठा बोझ, किसी भी तरह का हो, किसी भी रूप का हो, किसी भी प्रकार का हो, सुन्दर से सुन्दर मूर्ति हो, वो पिछले पांच को हटा नहीं रहा है। पिछले पांच के रूप में, हमारा अभिमान तो जम कर के बैठा ही हुआ है ना? वो तो वैसे के वैसे ही हैं। बल्कि इस छठे की सार्थकता ही हम इसी में जानते हैं, इस छठे को शुभ ही हम तभी कहते हैं, जब पिछले पांच बने रहें। यदि छठे के आने से, पिछले पांच की, हानि होती हो, तो हम छठे को, आग लगा देंगे।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

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