कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की

कर्त्तव्य संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारो निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८, श्लोक ५७) वक्ता: ‘सेंस ऑफ़ ड्यूटी’, कर्त्तव्यों के बारे में बात

जीवन में कोई गारंटी नहीं

ये सब सही और ग़लत तो सामाजिक मानसिकताएँ हैं। ना कुछ सही है, ना कुछ ग़लत है। सिर्फ एक ही सही है, समझ। और एक ही ग़लत है, समझ का अभाव, बाकि सब सामाजिक नैतिकता है, इनके फेरे में मत पड़ जाना ।

कैसे जियें?

जो भी कुछ कर रहे हो, खेल रहे हो तो पूरी तरह खेलो, सुन रहे हो तो सिफ सुनो, खा रहे हो तो सिर्फ खाओ, पढ़ रहे हो तो सिर्फ पढ़ो, बोल रहे हो तो पूरा ध्यान सिर्फ बोलने में, तब भूल जाओ कुछ भी और, यही ज़िन्दगी है, यही जीवन है। प्रतिपल जो हो रहा है, यही तो जीवन है, इससे अलग थोड़ी कुछ होता है जीवन।

1 2 3 4 5