अमरता का वास्तविक अर्थ

आना ही भ्रम था तो जाना कैसा? इसीलिए शरीर भाव से पृथक होना, अमृत्व के लिए पहला और आखिरी कदम है क्यूंकि जन्म तो आप शरीर का ही मानते हो। जो अभी अपने आपको जन्मित मान रहा है, वो तो प्रतिपल बस मृत्यु की ही ओर बढ़ रहा है इसलिए वो खौफ़ में जीएगा। कृष्ण इसीलिए अर्जुन को समझाते है बार बार कि, अर्जुन कोई समय ऐसा नहीं था, कोई काल ऐसा नहीं था, कोई स्थिति ऐसी नहीं थी, जब मैं ना रहा हूँ, तुम ना रहे हो और ये सारे योद्धा ना रहे हों। बस इतना ही है कि मुझे वो सब याद है, तुम्हें याद नहीं। उस याद को स्मृति मत समझ लीजिएगा, उस याद का अर्थ, बोध है मुझे। ये बोध नहीं है कि, ‘’हम हमेशा से हैं,’’ क्या बोध है? कि, ‘’हम हैं ही नहीं।’’ जब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘’अर्जुन तू मारने से क्यों डर रहा है, तू किसी को मार सकता नहीं,’’ तो उसका वास्तविक अर्थ समझिए। उसका वास्तविक अर्थ यही है कि अर्जुन, जो है ही नहीं उसे मारेगा कैसे? तू किसकी हत्या के पाप से डर रहा है, सपने में की गई हत्या का पाप लगता है?
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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न भाग्य, न कर्म, मात्र बोध है मर्म

आप जितने तनाव में होंगे, आपको उतनी ज़्यादा जरुरत पड़ेगी मनोरंजन की, मस्ती चीज़ ही दूसरी है। किस्मत कैसी भी हो, क्या हो सकता है एक ऐसा आदमी जो मस्त रहे? जो ऐसा हो सकता हो, वही असली आदमी है। जो कह रहा है, ‘’ठीक किस्मत कब हमारी थी लेकिन हम तो हमारे हैं ना। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, पाना-खोना इन सब में, हम तो मस्त हैं। बाहर-बाहर ये सब कुछ चलता रहता है, भीतर ये हमें स्पर्श भी नहीं कर जाता क्यूंकि भीतर, तो कुछ और है जो बैठा हुआ है। हमने भीतर की जगह खाली छोड़ी ही नहीं हैं किस्मत के लिए। किस्मत बड़ी ताकतवर है पर उसकी सारी ताकत हम पर बस बाहर-बाहर चलती है। किस्मत भी बाहरी और उसका ज़ोर भी हम पर बाहर-बाहर चलता है। भीतर तो हमारे कुछ और है, उस तक तो किस्मत की पहुँच ही नहीं है। किस्मत ‘उसे’ छू नहीं सकती, ‘वो’ किस्मत से कहीं ज़्यादा बड़ा, महत्वपूर्ण है।‘’ जानो उसको, पाओ उसको जो तुम्हें किस्मत ने नहीं दिया।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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किसको गुरु मानें?

ये कितना अश्लील तरीका है कहने का कि, ‘मैं गुरु बनाऊंगा’, यह करीब-करीब वैसी ही बात है जैसे कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म बनाऊंगा।’

आप गुरु करोगे क्या? गुरु क्या है? कामवाली है क्या आपकी?

टैक्सी करी जाती है ऐसे ही गुरु कर रहें हैं पर यही होता है – जैसे दुकानों में जाकर आप अन्य चीज़ें करते हो, ख़रीदते हो वैसे ही आजकल गुरु शौपिंग हो रही है; एक दूकान दो दुकान, ‘मैंने ख़रीदा है!’

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आप आमंत्रित हैं बोध सत्र में

दिनांक: 27 जुलाई, 2016
दिन: बुधवार
समय: शाम 6:30 बजे से

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