सतह पर जुड़ते हो, इसीलिए बिछुड़ने में दर्द होता है

किसी से मिला जाना तो सहज है, न मिल पाना मुश्किल है। न मिल पाने के लिए तो तुम्हें धारणाएँ रखनी होती हैं ना। ये गरीब है, इससे कैसे मिल लूँ, ये अजनबी है इससे कैसे मिल लूँ, इसकी आर्थिक स्थिति अलग है, इससे कैसे मिल लूँ? इसकी आर्थिक स्थिति अलग है, इससे कैसे मिल लूँ? ये आदमी है, ये औरत है, इससे कैसे मिल लूँ? ये तो बहुत उम्रदराज़ है, इससे कैसे मिल लूँ? ये तो अपनी ही उम्र का है, इससे कैसे मिल लूँ? न मिलने के लिए देखो कैसे कैसे प्रबंध करते हो। मिलना तो ज़ाहिर सी बात है, स्वाभाविक है। इसका कुछ भरोसा नहीं कल मिलेगा या नहीं, आज कैसे मिल लूँ? इससे मिलना तो व्यर्थ है, ये तो शादीशुदा है, इससे कैसे मिल लूँ?

मिलना तो सहज सी बात है, गए और मिल गए। मिलने के रास्ते में हमने दीवारें और अड़चनें  खड़ी करी हैं। आप जब तक आप हो, दूसरा तब तक दूसरा बना ही रहेगा। पराएपन का, बेगानेपन का भाव रहेगा ही। पानी हो जाना पड़ेगा, पत्थर होके काम नहीं चलेगा। पानी हो जाओ फिर जान जाओगे कि मिलने की, घुल जाने की, गुम हो जाने की बात क्या होती है।

आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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११. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

जिन्हें दिखना होता है, उन्हें दिख जाएगा। जो इतना डूबे न हों, जो इतने खोये न हों। सही शब्द का प्रयोग किया तुमने, ‘ईमानदारी’, जिनमें ज़रा ईमानदारी हो, उन्हें दिख जायेगा। वो कहेंगे, “न, कुछ गड़बड़ है, बहुत बड़ी गड़बड़ है। मैं जिस बहाव में हूँ, वो कोई गड़बड़ बहाव है। ऐसा नहीं कि वो मुझे गलत दिशा में ले जा रहा है, वो गलत तल पर है। ऐसा नहीं कि वो मुझे किसी गलत सागर में डुबो देगा, वो बहाव ही अम्लीय है, एसिडिक है।” आप किसी ऐसी नदी में डाल दिए गए हो, जिसमें तेज़ाब ही तेज़ाब है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो नदी किस सागर में जा कर मिलेगी।

उस नदी में डाला जाना ही तुम्हें ख़त्म कर रहा है, नष्ट कर रहा है। उस नदी में तुम्हारी मौजूदगी ही अभिशाप है तुम्हारे लिए। दिक्क्त बस इतनी है, कि क्योंकि तुम तेज़ाब की नदी में डाल दिए गए हो, इसलिए क्षण क्षण तुम घुलते जा रहे हो। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी संवेदना नष्ट होती जा रही है। जितनी देर तुम उस नदी में रहोगे, उतना तुम्हारे लिए असम्भव हो जाएगा ये जानना कि कुछ गलत है। क्योंकि जानने के जो तंतु हैं, जानने की जो आतंरिक व्यवस्था है तुम्हारी, ठीक उस व्यवस्था को ही वो तेज़ाब खाये जा रहा है। जितनी देर तक तुम उस नदी में हो, उतनी ये सम्भावना घटती जाती है, कि तुम कभी भी कह पाओगे, कि मैं गलत बहाव में हूँ, मैं गलत नदी में हूँ। नदी ने ही ये तय कर दिया है कि अब तुम जान नहीं पाओगे।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)
आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

   जागृति माह
   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

 आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें:  सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

धोखा भावनाओं का

भावुकता कुछ नहीं है| जब विचार का असर शरीर पर दिखने लगे, तब उसे भावुकता कहते हैं| तो भावना क्या है? भावना, विचार ही है जो अब दिखाई दे रहा है क्योंकि शरीर हिलने लग गया है, आँसू गिरने लग गए हैं, चेहरा लाल होने लग गया है| जब शरीर भी विचार का शिकार हो जाए, तो उस स्तिथि को क्या कहते हैं? भावना| उसमें कुछ ख़ास नहीं है|

आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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शास्त्रों को अक़्ल से नहीं पढ़ते

डर क्या है? ये विचार की मेरा कुछ खो सकता है, मैं किसी पर आश्रित हूँ, जिस पर आश्रित हूँ वो मेरा कुछ छीन सकता है| तुम्हारा होना ही दूसरे पर आश्रित है, तुम हो ही इसीलिए क्योंकि दूसरा है, तुम उसी दिन तक हो ना जिस दिन तक दुनिया है| कोई है यहाँ पर जो ये दावा करे की दुनिया मिट जायगी फिर भी मैं रहूँगा? दुनिया मिट गयी है और तुम टंगे हुए हो, खड़े हो कहीं पर, ऐसा हो सकता है? आश्रित हो न पूरे तरीके से दुनिया पर ?

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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