कचरे से मोह छोड़ना है वैराग्य; निरंतर सफाई है अभ्यास

अभ्यास का अर्थ है – ‘उस केंद्र से लगातार जुड़े रहना जिस केंद्र के परितः ये पूरी लीला चल रही है’।लीला से सम्प्रक्त नहीं हो जाना।केंद्र से जुड़े रहना, यही अभ्यास है।और ‘लीला से हटे रहने’ का नाम ‘वैराग्य’ है।लीला से हटे रहने का अर्थ ये नहीं है कि लीला जब चल रही हो, तब भाग गए, ‘लीला को लीला जानना ही वैराग्य है’।बस ‘जाने’ हुए हो, उसमें तुम्हें शामिल तो होना ही पड़ेगा।शरीर यदि है, और जिस हद तक तुम शरीर हो, उस हद तक लीला से तुम्हारी कोई भिन्नता नहीं हो सकती।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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तीन मार्ग- ध्यानयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग

कर्मयोग, याद रखना, उनके लिए है जो करने के शिकार हैं। जो संसार से बहुत बंधे हुए हैं, कर्म माने संसार, जो संसार से बहुत बंधे हुए हैं। जो कहते हैं कि, “दुकान छोड़ ही नहीं सकते, खानदानी दुकान है और दुकान छोड़ने के नाम से ही हम काँप जाते हैं”, तो उनको कहा जाता है कि, ‘ठीक है बैठो दुकान पर, पर मानो कि कन्हैया की दुकान है और आमदनी हो जाए शाम को तो ये न कहो कि मैंने कमा लिया, कहो कि प्रसाद मिला है।’

कृष्ण का प्रसाद है।

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झूठी आस्तिकता

अगर तुमने गीता जान ली तो तुमसे जन्माष्टमी उस तरीके से मनाई ही नहीं जायेगी जैसे लोग मनाते हैं। तुम वो सब कर ही नहीं पाओगे, जो दुनिया करती है कृष्ण के नाम पर। एक बार तुमने कृष्ण को जान लिया तो तुम कहोगे कि “छि:, कृष्ण के नाम पर यह सब होता है!” तुमने राम को जान लिया तो तुमसे दीवाली, दशहरा वैसे मनाये ही नहीं जायेंगे, जैसे दुनिया मनाती है।

दीवाली, दशहरा मना ही वही लोग रहे हैं, जिनका राम से कोई नाता नहीं। और जन्माष्टमी पर सबसे ज्यादा उछल-कूद वो कर रहे हैं, जिन्हें कृष्ण से कोई लेना-देना नहीं। उन्हें उछल-कूद से लेना देना है, मनोरंजन है। दीवाली, दशहरा क्या है उनके लिए? मनोरंजन है। कोई राम की भक्ति थोड़े ही है।

आँखें फिर से खोलना

वक्ता: यह प्रसंग गीता के दूसरे अध्याय के अंतर्गत दिया है| अर्जुन ने योगभ्रष्ट के बारे में पूछा है| योगभ्रष्ट कौन है, उसके विषय में अर्जुन ने खुद ही

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