आचार्य प्रशांत, श्री कृष्ण पर: जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय

हमारे लिए जागना यही है कि भौतिक शरीर पर दो जो भौतिक आँखें हैं, वो खुली हुई हैं तो हम कह देते हैं कि हम जगे हुए हैं। मुनि वो जो इस जगने को जगना माने नहीं और ये बात धारणा की नहीं है कि उसकी धारणा ये है कि तुम जगे हुए नहीं हो। मुनि वो जो साफ़-साफ़ देख पाए कि खुली आँखों से जो कुछ तुम्हें दिखता है, वो तुम्हारे अपने ही संकल्प-विकल्प हैं। वो प्रकाशित भले ही आपको तत्त्व से हो रहे हों पर उनको नाम-रूप तुमने खुद ही दे दिए हैं। उनमें कोई सत्य नहीं। उनका प्रकाश भले ही आत्मा का हो, पर उनकी सीमाएँ और विविधताएँ तुमने गढ़ी हैं।

तो इसीलिए खुली आँखों से तुम जो भी देखते हो उसको मुनि बहुत महत्त्व, बहुत प्राथमिकता नहीं दे सकता।

कृष्ण कह रहे हैं कि मुनि वो जिसकी जगने-सोने की परिभाषा वास्तविक है। जिसको इन्द्रियों ने छल नहीं लिया है। जो इतनी स्थूल बात नहीं करता कि आँख खुलने भर से अपना जागरण माने। मुनि वो जो ये अच्छे से जानता है कि दुनिया भर में ये तमाम लोग जो खुली आँखों के साथ घूम रहे हैं, वास्तव में गहरी मूर्छा से बाधित हैं। मुनि वो जो ये अच्छे से समझता हो कि चाहे आँख खुली हो या आँख बंद हो, तम्हारा स्वप्न लगातार कायम रहता है बस दृश्य बदल जाते हैं। और स्वप्न में दृश्यों के बदलने को या एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में चले जाने को जागरण नहीं कहते।

मुनि वो जिसके लिए जागरण का अर्थ ये नहीं है कि स्वप्न बदल गए बल्कि ये है कि स्वप्न अब नहीं रहे। तो कृप्या इस श्लोक का सम्बन्ध भौतिक या प्राकृतिक दिन-रात से बिलकुल न जोड़ें। कृष्ण नहीं कह रहे हैं कि मध्य रात्रि की साधना या रात भर के जगने भर से जीवन में कोई क्रांति आ जाएगी या कोई सिद्धि प्राप्त हो जाएगी। हाँ, ये सत्य है कि मैंने कहा था कि सूफी पद्यति में रात्रि जागरण का बड़ा महत्त्व है पर वो इसीलिए रहा है  क्योंकि साधक को शान्ति का जो माहौल चाहिए वो बहुथा उसे रात्रि में ही सुलभ हो पाता है। संसार सोया पड़ा होता है तो साधक को बहुत ज़्यादा विक्षेपों का सामना नहीं करना पड़ता। कान में आवाजें कम आती हैं, आँखों के सामने दृश्य कम रहते हैं ,दुनियादारी के झंझट थोड़े कम रहते हैं पर वो बात बहुत महत्त्व की नहीं है। अगर यही सारी स्थितियां दिन के समय उपलब्ध हो जाएँ तो रात्री को जगने की आवश्यकता कदाचित कम हो जाएगी।

रात्रि और दिन तो बस मानसिक हैं, कहीं बाहर नहीं हैं और जो कुछ मानसिक है वो प्राथमिक कैसे हो सकता है? कैसे उसे बहुत गंभीरता से लिया जा सकता है? कैसे कहा जा सकता हा कि उसके आधार पर तय होगा कि कौन जाग्रित है और कौन संयमी और कौन मुनि?

आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

कहानी तो कही जा रही है, हमें सुननी नहीं आती

ये पक्षी ऐसे ही नहीं गाते। जो आवाज़ आ रही है चिड़िया की वो फ़ालतू ही नहीं है। वो कुछ अभिव्यक्त कर रही है। क्या?

बाज़ी ले गए कुत्ते

जैसी ये पूरी दुनिया, मैं धरती की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं पूरी दुनिया की बात कर रहा हूँ। जैसी ये पूरी दुनिया है, उससे यदि ज़रा भी अलग होती तो ये पौधा नहीं हो सकता था। पूरी दुनिया जब इक्कठी हुई है, तब ये पौधा निकला है। सूरज न होता तो क्या ये पौधा हो सकता था? पूरी दुनिया में कुछ भी यदि कम या ज़्यादा होता तो ये पौधा नहीं हो सकता था। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ यही है, पूरी दुनिया ही है जो इस पौधे के रूप में दृश्यमान हो रही है, प्रकट हो रही है। अपने आप में वो पूरी दुनिया को समाये है। अब उसे जानना क्या है? अब क्या बचा जानने को? जो कुछ जानने लायक था, वो तो मैं हूँ। क्या जानना है? शेष क्या रह गया है? समझ रहे हो बात को?

ज्ञान अर्जित करने की बीमारी हमें है, सूचनाओं को संग्रह करने की बीमारी हमें है, न जीने की बीमारी, हमें है। दिमाग में बैठे रहने की बीमारी, हमें है। किसी पौधे की तरफ जब देखो, तो पौधे की तरह मत देखो, नाम मत दे दो कि पौधा है। समस्त प्रकट हो रही है। जो टोटल  है, जो पूर्ण है, वो इस पौधे के रूप में तुम्हारे सामने है। उसे झुक कर के, प्रणाम करना सीखो। एक नन्हा सा घास का तिनका भी है ना, वो अपने आप में पूरी कायनात को समेटे हुए है। उसे नन्हा मत समझ लेना।

इससे बड़ी भूल नहीं हो सकती कि तुम जानवरों को हीन समझो। इससे बड़ी मूर्खता नहीं हो सकती। और ये बात बिलकुल मन से निकाल दो कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा कुछ भी नहीं है। बिलकुल ऐसा कुछ नहीं है। ये बातें भी तुम्हीं ने कह दी हैं, कि मैन इज़ गॉड्स बेस्ट क्रिएशन।  गॉड  नहीं कहने आया था। वो सारी किताबें तुम्हारी ही हैं, जिसमें तुम ये दावा कर रहे हो, कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। अब जब तुम कहोगे तो तुम तो यही कहोगे, और कोई जानवर कभी कुछ कहने आएगा नहीं। वो कहेगा, इतनी भी परवाह कौन करे कि हम बताएँ कि कौन सर्वश्रेष्ठ है।

आचार्य प्रशांत
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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कर्म छू नहीं सकता शब्द से भी पाएगा कौन, राम तक पहुँचेगा मन होकर मात्र मौन

भजना अपने आप में कोई कृत्य है ही नहीं| पढ़ना कृत्य है, पढ़ना निश्चित रूप से कृत्य है। भजना कृत्यों के पीछे का अकृत्य है।

बाहर-बाहर तमाम कर्म चलते रहते हैं, बाहर-बाहर कर्ता मौजूद रहता है और उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके मौन का नाम है भजना। उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके सूक्ष्म संगीत का नाम है भजना।

तो, भजने को हम कोई गतिविधि न समझें, न बना लें। पढ़ना गतिविधि है, पढ़ना जैसा हमने कहा “उपकरण मात्र है मन को भजने की दिशा में ले जाने के लिए।” पढ़ने से यदि भजना संभव हुआ तो पढ़ना सार्थक।

और यदि पढ़ना दिन की एक और गतिविधि ही बन के रह गया तो वो पढ़ना व्यर्थ ही गया।

आचार्य प्रशांत
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सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है (Role-playing does not mean to be fake)

 
 

आचार्य प्रशान्त – Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)
आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

   जागृति माह
   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

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 आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय

संतों के, अवतारों के वचनों को बड़े समर्पण, बड़ी सतर्कता और बड़े ध्यान के साथ पढ़ें। एक नया ही कान चाहिए उन्हें सुनने के लिए, जब आपको लग भी रहा हो कि इन्होनें जो बात कही वो ठीक है, तो और सतर्क हो जाइए। चूँकि सम्भावना कम ही है कि सत्य आपको ठीक लगेगा। कृष्ण की बात अगर आपको प्रथमतया ही आपको जंच जाए और रुच जाए, तो संभावना यही है कि आप समझें ही नहीं हैं कि कृष्ण क्या कह रहे हैं, और कृष्ण के वचन का आपने अपनी सुविधा अनुसार, अपने अनुकूल कोई अर्थ कर लिया है और विधि यही है कि जो कुछ कहा गया हो, उसे बस दो हिस्सों में बाट लें क्यूँकी दो शब्दों के अलावा कृष्ण कोई तीसरा शब्द बोलते नहीं और अंततः वो ये चाहते हैं कि आप इन दो शब्दों के भी पार निकल जाएँ और गहरे मौन में प्रवेश कर जाएँ। वही मौन सत्य है।
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