31वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की

31वां अद्वैत बोध शिविर

क्या आप कभी सोए हैं?

गहरी नींद में सोए हैं? ‘हमारी इन्द्रियां सो जाती हैं; आँखें सो जाती हैं; कान सो जाते हैं।

पर क्या कभी आप सो पाते हैं?

असली, गहरी नींद में चलने के इस आमंत्रण को स्वीकार करें।

दिनांक : 26-29 जनवरी, 2017

स्थान : शिवपुरी, ऋषिकेश

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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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रस नज़दीकी में हैं

आप गलत जगह पर गलत चीज़ खोज रहे हो। जो रसना कृष्ण से मिलनी है, वो कृष्ण से ही मिलेगी; वो कामना में नहीं मिलेगी। जो रस कृष्ण देंगे, वो रस सिर्फ़ कृष्ण ही दे सकते हैं, कामनाएं नहीं देंगी। जो रस आत्मा से ही बहना है, वो रस आत्मा से ही बहेगा, अहंकार से नहीं बह पाएगा।

तलाश सब को एक ही की है। हम सब एक ही हैं, तो तलाश भी सब को एक ही की है, बस कुछ खोजने निकल पड़े हैं और जो खोजने निकल पड़ता है, वो अपने ही तल पर खोजता रह जाता है। उस तल पर मिलेगा नहीं। तलाश सबको उसी रस की है, जिसका नाम सत्य है। उपनिषद् कहते हैं रसोवई सख, वह रस रूप है। रस का अर्थ होता है सार, एसेंस, जूस कि जैसे बाहर-बाहर दिख रहा हो जो, उसके भीतर की मिठास, उसके भीतर का सत्व, वह ‘वह’ है। वह रस रूप है।
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आचार्य प्रशांत के सानिध्य में ३१वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।

आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न जाने दें।

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ध्यान क्या है?

ध्यान का मतलब हुआ निरंतर तुम्हारे मन में अपने से किसी के ऊपर होने का भाव मौजूद रहे। मन कभी इतना दुराग्रही ना हो जाए कि अपनेआप को सेवक से ऊपर कुछ और समझ ले। मन हमेशा किसी एक के सामने झुका हुआ रहे। और वो जो कोई एक है वो मन की कोई कल्पित वस्तु, विचार नहीं हो सकता । क्योंकि अगर मन अपनी ही किसी कल्पित इकाई के सामने झुका, तो फिर अपने ही सामने झुका यानि कि झुका ही नहीं। तो मन को यदि झुकना है तो मन को किसी बाहर वाले के सामने झुकना पड़ेगा – इस का नाम ध्यान है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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समर्पण का वास्तविक अर्थ

घुटने टेकने का नाम नहीं है समर्पण, हारने का नाम नहीं है समर्पण, कमज़ोर हो जाने का नाम नहीं है समर्पण। समर्पण का अर्थ है, ‘’मैंने अपनी कमज़ोरी को समर्पित किया; अब मैं मात्र बल हूँ।’’ समर्पण का अर्थ होता है: असीम ताकत।
समर्पण का अर्थ ये नहीं होता कि, ‘’मैं छोटा हूँ, नालायक हूँ, बेवकूफ़ हूँ।’’ समर्पण का अर्थ होता है कि, ‘‘मेरे भीतर जो नालायकी थी, मेरे भीतर जो क्षुद्रता थी, मैं जो पूरा का पूरा ही कमजोरियों का पिंड था; मैंने इसको छोड़ा, मैंने इसे समर्पित किया।’’ यह होता है समर्पण। समर्पण का ये अर्थ मत समझ लेना कि कहीं जा कर के अपनेआप को प्रस्तुत कर देने का नाम समर्पण है, परिस्थितियों की चुनौती का जवाब न दे पाने का नाम समर्पण है, जीवन से हारे-हारे रहने का नाम समर्पण है। ये सब समर्पण नहीं है, ये तो कमजोरियाँ हैं, बेवकूफ़ियाँ हैं।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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हारोगे तुम बार-बार, बस कोई हार आखिरी न हो

अपने प्रति सहानुभूति रखें। अपने विरुद्ध मत खड़े हों। हम हारे हुए ही हैं, और हम हारेंगे बार-बार, बस इतना कर लीजिए कि कोई भी हार आखिरी ना हो। एक सुनने वाला कान होगा, जो कहेगा कि मैंने जो कहा, वो बहुत हारा हुआ वक्तव्य है। और मैं बात हार की ही कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि हारे हुए हम हैं, और हारेंगे हम बार-बार। बस इतना तय कर लीजिए कि कोई भी हार, आखिरी नहीं होगी। यही आपकी बड़ी जीत है।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

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न हुआ न हो रहा न होने के आसार,पर होता खूब प्रतीत होता ये संसार

जो स्रोत है, केंद्र है, वो बड़ा ही चंचल है। उसका स्वभाव आनंद का है। कोई वजह नहीं, कोई कारण नहीं, कोई जल्दी नहीं, कोई चिंता नहीं, और कोई कारण उस तक नहीं पहुँच सकता। एक तरह से तो स्रोत एक छोटे बच्चे की भाँति है, अपने में ही व्यस्त, चंचल, चिंतारहित और कुछ नहीं। स्रोत को एक छोटे, नंगे बच्चे की तरह भी अवधारित कर सकते हैं — अगर अवधारित ही करना है — जिसे कोई मतलब ही नहीं है, वो क्या कर रहा है? समझ लीजिए कि वो कहीं खड़ा है, कहीं पर रेत पर खड़ा है, किसी समुद्रतट पर खड़ा है। उसको फ़र्क ही नहीं पड़ रहा कि उसके दौड़ने से, रेत पर क्या निशान पड़ रहे हैं, और जो रेत पर निशान पड़ रहे हैं, उसको हम अपना जीवन कहते हैं।
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हिमालय की गोद में 30वें बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशंत्ब के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के उर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च

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