हम शरीर तक का तथ्य तो बर्दाश्त नहीं कर पाते, हम परम सत्य क्या बर्दाश्त करेंगे?

वैलेंटाइन डे मनाने की एक ही जगह हो सकती है, “मंदिर”, “मस्जिद”। जाओ, खड़े हो जाओ जीसस के सामने, और बोलो, “आई लव यू”, और

असली प्रेमी हो, तो प्रेमिका का अहंकार काटो

कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो तुम कृष्ण हुए। हमें तो कोई प्यारा लगता ही इसी शर्त पर है, कि उसका कुछ छिपा हुआ हो। नंगा शरीर तुम्हें उतनी उत्तेजना नहीं देता होगा, जितनी अधनंगा देता है। कभी गौर किया है? कृष्ण तुम तब हुए जब तुम्हें सब दिख जाए, पूर्ण नग्न, एक एक तथ्य जान गए जीवन का। सब खुला सा है। आँखें खुली हुई हैं, मन ध्यानरत है। और फिर कहते हो कि अब होगा रास। तब हुए तुम कृष्ण, ऐसे थोड़े ही कि प्रेम करने के लिए भी चीज़ें छुपा रहे हैं ।
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अद्वैत बोध शिविर

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जो डूबने से डरते हैं, गहराइयाँ उनके लिए नहीं है

धर्म को जीवन की अवज्ञा मत बना लीजियेगा। धर्म को, कृत्रिम गंभीरता मत बना लीजियेगा। वयस्कता, प्रौढ़ता, मैच्युरिटी, के नाम पर धर्म को, एक बोझ सा मत बना लीजियेगा।
आम जीवन में आप अपनेआप को पूरा अधिकार देते हैं, हंसने का, खेलने का। आप जब उपनिषदों के साथ भी बैठें, तो अपनेआप को उनसे खेलने का हक़ दें। आप मुझसे बात कर रहे हैं, बीच में कुछ गलत नहीं हो जायेगा, यदि आप ठहाका मार दें। ठहाका नहीं मार सकते, तो कम से कम मुस्कुरा ही दीजिये। धर्म का मतलब मुर्दा हो जाना नहीं है। लेकिन मैं देखता हूँ, कि धार्मिक आयोजनों में अधिकांशत: वही लोग जुड़ते हैं, जो या तो मर चुके होते हैं, या जिनकी मरने की पूरी तैयारी होती है।
~ आचार्य प्रशांत
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सत्य – मूल्यवान नहीं, अमूल्य

मूल्यवान वो, जो बहुत क़ीमती है पर उसकी क़ीमत है, सौ का नहीं है, तो एक लाख का है। पर अमूल्य माने वो जो किसी और आयाम में है, डाईमेंशन ही दूसरा है, उसकी क़ीमत लग ही नहीं सकती, वो गिनती से बाहर है। आप मूल्यवान को ख़ोज रहे हो, इसीलिए आपको फिर मूल्यों की गिनती करनी पड़ती है, जो अभी आप कर रहे हो कि, “एक को पकड़ा, तो दूसरा छूटता है तो फिर गणित का हिसाब-किताब करना पड़ता है कि इसका मूल्य कितना था और उसका मूल्य कितना था?”

अमूल्य, ‘उसको’ जानो, ‘उसका’ मूल्य न कम है, न ज़्यादा है। जब कहा जाता है मूल्यवान, तो आपको ये भ्रम हो जाता है कि “अमूल्य वो, जो मूल्यवान से भी ज्यादा कीमती हो” गलत है धारणा ये। अमूल्य वो, जिसकी कोई क़ीमत नहीं, न कम न ज़्यादा। वो सभी कीमतों से हट कर के है।
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दृश्य और द्रष्टा – द्वैत के दो सिरे

मन वाणी का स्वामी रहे, विवेक मन का स्वामी रहे और विवेक आत्मा से उद्भूत हो और आत्मा से क्या अर्थ है? वही जो मेरा तत्त्व है, जो मेरा मूल तत्त्व है। सब कुछ उससे जुड़ा हुआ रहे, वही स्रोत रूप रहे। मन स्रोत में समाया हुआ है, मन स्रोत में समाया हुआ रहे। यही जब मन स्रोत से अलग होता है उसी को फिर भक्ति वाणी विरह का नाम देते हैं। मन का स्रोत से अलग हो जाना ही विरह है।
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क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार

जब जो होता है उससे तुम राज़ी हो जाते हो, तो तुम्हें फिर वो मिल जाता है, जो तुम्हारे राज़ी होने से आगे की बात है। परमात्मा कहता है कि जब तुझे वो ही पसंद नहीं, जो मैंने तुझे दिया, तो तुझे देने वाला कैसे पसंद आ जाएगा? जो भी उसने तुम्हें दिया है, भले ही उसने तुम्हें बदबू दी है, तुम पहले उसका सहज स्वीकार करो। फिर जिसने दिया है, वो भी तुम्हें मिल जाएगा। मैं तुम्हें कोई उपहार दूँ, तुम्हें वही पसंद नहीं आ रहा, तो तुम्हें देने वाला कैसे पसंद आएगा? तुम जो भी हो, जैसे भी हो, तुम्हें वही मिला है। उसके साथ शान्ति रखो। स्वीकार रखो। वही मिला है तुम्हें।

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