घर बैठकर रोटी और बिस्तर तोड़ने की आदत || आचार्य प्रशांत (2019)

दो ही चीज़ें होती हैं देखो – या तो बोध का मार्ग, या योग का मार्ग।

भारत ने दोनों को ही आज़माया है, दोनों ही सफल रहे हैं। 

बोध का मार्ग कहता है – “जानो, और जानने के फलस्वरुप तुम्हारे कर्म और निर्णय बदलेंगे। भीतर प्रकाश उदित होगा, तो तुम्हारे जीवन में दिखाई देगा। तुम्हारे सब कर्मों में दिखाई देगा”।

ये ‘बोध’ का मार्ग है। 

योग का मार्ग दूसरा है।

वो कहता है – “ढर्रे मृत होते हैं। उनको अगर प्रकाश से तोड़ेंगे, तो बड़ा समय लगेगा”।

“तो उनको विधियों से तोड़ो”।  

जीवन में क्या चुन रहे हो, गौर करो || आचार्य प्रशांत (2019)

आदमी कितना हारा हुआ है, ये उसे ही पता चलता है, जिसने जीतने की पूरी कोशिश कर ली है।

जो जीतने की कोशिश ही नहीं कर रहा, जो साधना ही नहीं कर रहा, उसको सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि वो आजीवन इसी भ्रम में जीता है कि – “साहब अभी हमने कोशिश ही नहीं की है। जिस दिन हम मैदान में उतरेंगे, मैदान हमारा है”।

मैदान में उतरो न।

मैदान में उतरोगे, तभी तो अपनी गहरी शिकस्त का अहसास होगा।

दूसरों को जान पाने का तरीका || आचार्य प्रशांत (2019)

दूसरे को जान पाने, देख पाने, समझ पाने में हमसे इसीलिये भूल हो जाती है न, क्योंकि हमें खुद का ही कुछ पता नहीं।

दूसरे को देख पाने की यदि हममें योग्यता होती, तो हमने उसी योग्यता का उपयोग करके, पहले खुद को ही न देख लिया होता।

दूसरों की मदद करने की ज़रूरत क्या है? || आचार्य प्रशांत (2019)

दुनिया में जितने भी कुकृत्य हैं, पाप हैं, अध्यात्म सीधे उनकी जड़ काट देता है।

और जो भांति -भांति के सामाजिक आन्दोलन होते हैं, वो सिर्फ पत्ते नोचते हैं, टहनियाँ तोड़ते हैं।

सामाजिक आन्दोलन इसीलिये कभी विशेष सफल नहीं हो सकते।

श्रद्धा क्या है? आत्मविश्वास से श्रद्धा का क्या संबंध है? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

तुम्हें पता होना चाहिये कि तुम्हारा हित कहाँ है।

तुम्हें दिखना चाहिये कि ये चिकित्सक तुम्हारे साथ जो कुछ भी कर रहा है, उसी में तुम्हारा फायदा है। और अगर तुम भागोगे, तो नुकसान अपना ही करोगे।

यही चीज़ तुमको अडिग रख सकती है, गुरु के पास।

और कुछ नहीं।

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