हदों में चैन कहाँ पाओगे?

कबीर की सारी अभिव्यक्तियाँ विचार की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, वो विचार जनित नहीं हैं। चूँकि वो विचार से नहीं आ रही हैं तो हम उनको कहते हैं कि वो सीधे ह्रदय से आ रही हैं, या वो आत्मा के फूल हैं; एक ही बात है।

इतना ही समझना काफी है कि सोच-सोच के नहीं बोला है।

सारी बेचैनी किसलिए?

अकर्ता का अर्थ कर्म का निषेध नहीं होता है।

कर्म को रोक देने का नाम नहीं है ‘अकर्ता’ हो जाना।

अब तो आप ‘कर्ता’ हो।

और वो कर्ता क्या कर रहा है?

कर्म को रोक रहा है।

असली आज़ादी है आत्मा

शरीर भर है जिसे पूरी तरह बाँधा जा सकता है। मन पर सीमा लगाने की कोशिश की जा सकती है पर वह बहुत सफल होगी नहीं और आत्मा पर तो वह कोशिश भी नहीं की जा सकती।

तो इंसान है जो बाँधने की कोशिश करता है और वह भी उसी हद तक जिस हद तक तुम्हारा आचरण है।

अब एक इंसान दूसरे इंसान के आचरण को बाँधने की कोशिश कर रहा है।

पक्षी, आकाश, नदी, और तुम

रविवार सुबह को बोधपूर्ण बिताने का एक बेहतरीन मौका !
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आप आमंत्रित हैं इस रविवार 15 नवम्बर, श्री प्रशांत के व्याख्यान में:

विषय: धर्म क्या है?
स्थान: महर्षि रमण केंद्र, लोधी रोड, नयी दिल्ली
समय: 9:45 am
वक्ता: श्री प्रशांत (http://www.advait.org.in/shri-prashant.html, http://hindi.prashantadvait.com/about/)
आयोजक एवं संपर्क: 09910685048

धर्म-सम्बंधित अपने प्रश्नों के समाधान के लिए ज़रूर आयें| अन्य उत्सुक जनों को भी साथ लायें, सबका स्वागत है |

मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार

जो शरीर को दबायेगा, शरीर उसके ऊपर छा जायेगा।
उसके रेशे-रेशे से, बस शरीर आवाज़ देगा, क्योंकि शरीर को तुम दबा सकते नहीं।
फिर शरीर इधर से, उधर से, हज़ार तिकड़में कर के, अपने आप को अभिव्यक्त करेगा।

जो जगह शरीर को नहीं लेनी चाहिये, उस जगह पर भी शरीर जा कर के बैठ जायेगा।
शरीर तुम्हारी पूजा भी बन जायेगा, शरीर तुम्हारा प्रेम बन जायेगा,
यहाँ तक कि तुम्हारा मोक्ष भी शरीर बन जायेगा।

जिन्होंने शरीर को खूब दबाया होता है, वो जब मोक्ष की भी कल्पना करते हैं,
तो यही सोचते हैं कि हम ऐसे ही कहीं और अवतरित हो जायेंगे।
“हमें मोक्ष मिल गया, अब हम ऐसे ही किसी और लोक में पहुँच जायेंगे, सशरीर।”

शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को ‘शरीर’ रहने दो।
जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें।
जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें।
शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।

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