अर्थ द्वारा समझे तो अच्छा, बिना अर्थ समझे तो और अच्छा

सुना मात्र तब जाता है, जब शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।

वास्तव में सुना तभी गया, जब भूल ही गए कि क्या कहा जा रहा है। हर कहने-सुनने का जो परम उद्देश्य है, वो ये भूल जाना ही है।
समझिएगा बात को। सुनने की निम्नतम अवस्था तो वही है कि शब्दों पर भी ध्यान नहीं गया और फिर आगे बढ़ते हो तो चलो, कम से कम शब्द कान में पड़ने लग गए। स्मृति ने काम करना शुरू किया। उनमें अर्थ भरने शुरू कर दिए, पर वास्तविक सुनना अभी भी नहीं हो पाया।
असली सुनना तब हुआ, जब भूल ही गए कि किसी ने कहा क्या था?
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर िआयोजित किया जाने वाला है।
आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएँ।

आवेदन हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com

अन्य जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

आशा और ममता: नास्तिकता की निशानी

आशा नास्तिकों का काम है, वैसे ममता भी किसी नास्तिक का ही काम होगा।

जिसमें श्रद्धा है, जो परम से संसर्ग में है, उसमें ममता हो ही नहीं सकती। आशा देखती है भविष्य की ओर और ममता देखती है, दूसरों की ओर। दोनों में से कोई भी नहीं है, जो अपनी ओर देखता हो, जो परम की ओर देखता हो, जो सत्य की ओर देखता हो। आशा ने और ममता ने दोनों ने ही बड़े सस्ते विकल्प ख़ोज लिए हैं। दोनों ने ही दो बड़े सस्ते झूठ ख़ोज लिए हैं।

आशा कर्म कराएगी भविष्य के लिए और ममता कर्म कराएगी दूसरे के लिए और जब तक ममता की वस्तु मौजूद रहेगी तब तक सारे कर्म बस उसके लिए होंगे, और गहरे कर्म में लिप्त होना ही पड़ेगा।

आशा-बेचैनी का झूठा इलाज

आशा नास्तिकों का काम है, वैसे ममता भी किसी नास्तिक का ही काम होगा। जिसमें श्रद्धा है, जो परम से संसर्ग में है, उसमें ममता हो ही नहीं सकती। आशा देखती है भविष्य की ओर और ममता देखती है, दूसरों की ओर। दोनों में से कोई भी नहीं है, जो अपनी ओर देखता हो, जो परम की ओर देखता हो, जो सत्य की ओर देखता हो। आशा ने और ममता ने दोनों ने ही बड़े सस्ते विकल्प ख़ोज लिए हैं। दोनों ने ही दो बड़े सस्ते झूठ ख़ोज लिए हैं। आशा कर्म कराएगी भविष्य के लिए और ममता कर्म कराएगी दूसरे के लिए और जब तक ममता की वस्तु मौजूद रहेगी तब तक सारे कर्म बस उसके लिए होंगे, और गहरे कर्म में लिप्त होना ही पड़ेगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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आनंद की तलाश

तुम बार-बार आनंद की ही तलाश करते हो क्योंकि तुम्हारे मर्मस्थल में याद बसी है उसकी।जैसे कोई बचपन में ही घर से बिछुड़ गया हो, और उसे घर की, माँ की, धुंधली-सी स्मृति बुलाती हो।

आनंद की तलाश तुम्हें इसलिए है क्योंकि आनंद तुम्हारा घर है, स्वभाव है। उसके बिना चैन कैसे पाओगे तुम? पैसा, इज्ज़त, उपलब्धियाँ – इनके साथ भी विकलता बनी ही रहेगी। माँ का विकल्प खिलौने नहीं हो सकते।

अस्ति है समाप्ति,शून्यता है अनंतता

तुमने कहानी यदि शुरू कर दी है, तो वो कहानी लगातार बदलती रहेगी। कहानी का अर्थ ही यह है कि जिसमें निरंतर समय और स्थितियों के साथ बदलाव आ रहे हैं। कहानी तो लगातार बदलती ही रहेगी और एक दिन ख़त्म भी हो जाएगी। कोई कहानी अनंत तक नहीं चल सकती। यदि कुछ ऐसा है जो ना बदल रहा हो और न ख़त्म हो रहा हो, तो वो कहानी के पीछे का मौन ही हो सकता है। बड़ी से बड़ी संख्या भी घिस-घिस के छोटी हो जानी है और अंततः विलुप्त हो जानी है।
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