माँ-बाप मुझे समझते क्यों नहीं?

कौन है जो कुछ भी समझता है? क्या कोई भी कुछ भी समझ रहा है? सब सिर्फ एक सोच के गुलाम हैं। माँ-बाप भी ऐसे ही लोगों में से हैं। तो इसमें ताजुब्ब क्या है कि उन्हें कुछ भी क्यों नहीं समझ आता? माँ-बाप हो जाने से अचानक आप में कोई दैविक गुण तो आ नहीं जाएंगे। माँ-बाप हो जाना तो सिर्फ एक शारीरिक प्रक्रिया है।

न सामाजिक न पशु

जानते हो हिंदी में पशु को क्या कहा जाता है ? पशु l धातु है पाश और पाश का मतलब है बंधन l जो भी गुलाम है वही पशु है l “मनुष्य एक सामाजिक पशु है” कहने का अर्थ ये हुआ कि मनुष्य को पाश में – दासता में- अनिवार्यतः रहना ही होगा, कि दासता मनुष्य का प्रारब्ध है l

बाहरी प्रेरणा साथ नहीं देती

बाहरी आता है, एक माहौल बनाता है, तुम्हारे मन को बिलकुल आंदोलित कर देता है l उसके रहते मन आंदोलित होता है पर क्या ऐसा उत्साह सदा रह सकता है? प्रभाव जाएगा और उसके साथ तुम्हारा उत्साह भी चला जाता है l

और क्या जीवन हमने ऐसे ही नहीं बिताया है ?

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