जो पकड़ेगा वो गँवायेगा

प्रेम को आप आँख से देख नहीं पाएंगे। आनंद को आप हाथ से पकड़ नहीं पाएंगे। मुक्ति का आप कोई चित्र नहीं बना सकते। सत्य का कोई नाम नहीं होता लेकिन ये हैं, और यही वास्तविक हैं। जीसस कह रहे हैं, इन्हीं की दुनियां मे तुम आखिरी रहोगे। जो द्वैत की दुनिया में अव्वल है, वो अद्वैत की दुनिया में आखिरी रहेगा। ना उसे सत्य मिलेगा, ना प्रेम मिलेगा, ना आनंद, ना मुक्ति।
जो खूब पदार्थों के पीछे भाग रहा है, जो खूब प्रतिष्ठा कमा रहा है, जिसने ज़मीन को, पत्थर को और आसमान को, इन्हीं को सच मान लिया है, वो असली दुनिया में, अपनी भीतरी दुनिया में — जहाँ उसका घर ही है — वहां वो तड़पेगा, वहां उसे कुछ न मिलेगा, वहां वो कतार में आखिरी नज़र आएगा।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

कब सुनोगे उसकी आवाज़?

एक विचित्र सा जमावड़ा है, माहौल है जिसमें आप कभी खेंच कर, कभी धकियाए जाकर डॉक्टर के पास आते हैं पर यह पक्का करके आते हैं कि बीमारी छोड़नी नहीं है। यह ऐसी बीमारी है जिसने अस्पताल को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जो बीमार अस्पताल को भी अपने अनुकूल बना ले उसका कोई इलाज अब संभव नहीं है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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जिसने माँगा नहीं उसे मिला है

हम अपनी ही जड़ों को काटते चले हैं| हमें भय है अपने ही विस्तार से|

किसी ने कहा है कि, “हमें किसी से डर नहीं लगता, हमें अपनी ही अपार सम्भावना से डर लगता है|”

कहीं न कहीं हमें पता हैं कि हम अनंत हैं| कहीं न कहीं, हमें पता है कि क्षुद्रता हमारा स्वभाव नहीं| हम अपनेआप से ही डरते हैं, अपनी ही संभावना से बड़ा खौफ़ खाते हैं| अगर हमें हमारी संभावना हासिल हो गयी, तो होगा क्या हमारे छोटे-छोटे गमलों का? हमें उनसे बाहर आना पड़ेगा|