शास्त्रों को अक़्ल से नहीं पढ़ते

डर क्या है? ये विचार की मेरा कुछ खो सकता है, मैं किसी पर आश्रित हूँ, जिस पर आश्रित हूँ वो मेरा कुछ छीन सकता है| तुम्हारा होना ही दूसरे पर आश्रित है, तुम हो ही इसीलिए क्योंकि दूसरा है, तुम उसी दिन तक हो ना जिस दिन तक दुनिया है| कोई है यहाँ पर जो ये दावा करे की दुनिया मिट जायगी फिर भी मैं रहूँगा? दुनिया मिट गयी है और तुम टंगे हुए हो, खड़े हो कहीं पर, ऐसा हो सकता है? आश्रित हो न पूरे तरीके से दुनिया पर ?

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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