प्रतियोगी मन – हिंसक मन || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

एक स्वस्थ मन कभी -भी दूसरे से तुलना नहीं करता।

प्रतियोगिता का अर्थ ही है – तुलना।

एक स्वस्थ मन अपने में रहता है, वो अपने आनंद के लिए काम करता है, दूसरे को पीछे करने के लिए नहीं।

प्रतियोगिता का अर्थ ही है – दूसरे को पीछे छोड़ने की भावना।

किस दिशा जाऊँ?

पाने की इच्छा हीनता के भाव से निकलती है| इच्छा पूरा होना चाहती है, ख़त्म हो जाना चाहती है, जो असंभव है| कुछ भी पा कर जीवन की रिक्तता ख़त्म नहीं होती| वो जो हीन नहीं है, वो तुममे ही सोया हुआ है| उसे जगाओ, उसकी तरफ ध्यान दो|

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