दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए

जो ही जगेगा, वो ही करुणा से भर जाएगा| जागृति कठोरता नहीं देती, जागृति करुणा देती है और यदि आप पाएं कि जागृति से संवेदनशीलता मर रही है, आप में करुणा का भाव नहीं उदित हो रहा, तो स्पष्ट समझ लीजिएगा कि आपकी जागृति सिर्फ़ आपके मन की एक कल्पना है, आप जगे नहीं हैं| जगा हुआ व्यक्ति पूरे संसार के लिए शुभ सन्देश होता है, सूरज की तरह होता है जो पूरी दुनिया का अँधेरा मिटाए| जगे हुए होने का अर्थ ही यही है कि, ”अब आत्म-केन्द्रित नहीं रहा, कि अब मेरा आत्म ब्रह्म हो चुका है| अब आत्म अहंकार के साथ संयुक्त नहीं रहा, अब आत्म वृहद हो चुका है, इतना फ़ैल चुका है कि उसमें सब समा गए हैं|अब मैं ये नहीं दावा कर सकता कि, ”किसी और का घर, अब मैं ये नहीं कह सकता कि, संसार का दुःख| मैं समष्टि के साथ एकाकार हूँ|’’
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
https://href.li/?http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

उचित-अनुचित में भेद कैसे करें?

एक जगा हुआ, एक वास्तविक रूप से बुद्धिमान व्यक्ति जो अपनी निजता में जीता है, वो कभी भेड़ नहीं हो सकता। उसे कोई शौक नहीं है कि किसी का आवागमन करने का और ना वो चाहता है कि कोई और उसका अनुगमन करे। वो कहता है ‘’हम सब पूर्ण ही पैदा हुए हैं।’’ गहरी श्रद्धा है उसके जीवन में, कहता है ‘’बोध सबको उपलब्ध हो सकता है। उस परम की रोशनी हम सबको ही मिली हुई है।’’ और यही व्यक्ति फिर मानवता का फूल होता है “दा सॉल्ट ऑफ अर्थ।” उसके रास्ते में अड़चनें आ सकती हैं, उसे पागल घोषित किया जा सकता है क्योंकी जो समाज के अनुसार ना चले, समाज को वो पागल ही लगता है। उसको ख़तरनाक कहा जा सकता है क्योंकि अन्धेरे के लिए वो खतरनाक ही है, रोशनी होकर।लेकिन वो लोग भी, जो उसे खतरनाक घोषित कर रहे होते हैं, जो उसको पागल कह रहें होते हैं, पत्थर मार रहे होते हैं, ज़हर पिला रहे होते हैं, वो भी कहीं ना कहीं उसकी पूजा कर रहे होते हैं। मन ही मन कहते हैं ‘’काश, हम भी ऐसे हो सकते। हाँ, मारना तो पड़ रहा है इसे, पर काश हमें भी इसकी थोड़ी सी सुगन्ध मिल जाती।‘’
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

कामनाग्रस्त मन जगत में कामुकता ही देखेगा

काम, जीवन का ही हिस्सा है, जीवन को नहीं समझा है, काम को भी नहीं समझा है, जब काम को समझा नहीं जाता तो सर चढ़ के बोलता है| जब काम को समझा नहीं जाता, तो वो बिलकुल हावी हो जाता है मन पर| वो फिर एक रोज़मर्रा की, आमतौर की, छोटी घटना बन कर नहीं रह जाता, फिर वो जीवन का एक हिस्सा नहीं, वो जीवन पर छाया हुआ बादल बन जाता है| जिसने सब कुछ ढक रखा है, मेरा उठना, बैठना, हंसना, छूना, सोचना, सब काम से भरा हुआ है|
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वक्ता द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

योग का क्या अर्थ है?

योग के लिए कुछ पाना नहीं है। जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है- आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यूँ? क्यूँकी पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है। ठीक? आप योगी नहीं हो सकते। योगी होने का अर्थ है- मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबीलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिल्कुल, बिल्कुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है- ये योग है। रंग अलग-अलग है दोनों के पर तत्व एक हैं। यही योग है। अब दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

फ़ायदे का फ़ायदा क्या?

फ़ायदे का फ़ायदा क्या है?

तुम बचपन से ही तो फ़ायदे की तलाश में नहीं थे| तुम्हें ये किसने सिखाया कि फ़ायदा बड़ी बेहतरीन चीज़ है|

फँस गये?

जो ये फ़ायदा तुम खोज रहे हो, तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदे का कुछ फ़ायदा होता है?

ये तुमने बस सुन लिया है| तुम्हारे चारों ओर एक समाज है जो फ़ायदे के पीछे भाग रहा है| घर में भी तुमने यही देखा है, तो तुम्हें लगता है कि फ़ायदा कोई बहुत अच्छी बात होगी|

तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदा फ़ायदेमंद है?

सकारात्मक सोच- मात्र भ्रम

हम मन के मूलभूत द्वैत को नहीं समझते । मन में जो कुछ होता है वो अपने जोड़े के साथ होता है पर चूँकि हमारी नज़रें पूरे को नहीं देख पातीं तो इसलिए हम सिर्फ सुख को देख पाते हैं और ये नहीं समझ पाते कि ये सुख मिल ही इसीलिए रहा है क्योंकि हम बहुत दुःखी हैं । जो दुःखी नहीं हो, उसे सुख मिल ही नहीं सकता और चूँकि हमें सुख चाहिए, इसलिए हम ख़ूब-ख़ूब दुःखी होते हैं । ख़ूब दुःखी हो जाओ, फ़िर सुख मिले जायेगा । और होता भी यही है, जितना दुःखी होगे, उतना सुख मिलेगा ।

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