आओ, डूबो, बाकी सब भूलो

सारे धर्मो का परित्याग कर दो, धर्मो का परित्याग करो, धार्मिक हो जाओ। धर्मो को छोड़ो, धार्मिक हो जाओ। बात समझ में आ रही है? और धार्मिक वही हो सकता है, जिसने धर्मो को छोड़ दिया। ठीक वही बात यहाँ पर कह रहे है, कर्तव्यो को छोड़ो, और जो एकमात्र कर्तव्य है, जो तुम्हारा एकमात्र दायित्व है उसको पूरा करो, तुम्हारा एकमात्र दायित्व है? योग। मुझमें आकर मिल जाना, मुझमें लीन हो जाओ इसके अलावा तुम्हारा कोई कर्तव्य ही नहीं है।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

तुम्हारी बेवफ़ाई ही तुम्हारी समस्या है

तुम ये देखो कि तुम्हें कष्ट क्यूँ होता है समझना इस बात को। जैसे तुम कष्ट के चक्कर में फँसे हो न ठीक उसी तरह से दुसरे लोग भी फँसे हैं। जब तुम ये समझ जाओगे कि तुम कैसे फँसे तो तुम दूसरों के चक्कर भी समझ जाओगे। जब तुम ये समझ जाते हो कि कोई कैसे फँसा तो तुम्हें कष्ट से मुक्ति का रास्ता भी मिल जाता है। फिलहाल तो तुम असंभव की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि जैसे लोग हैं, जैसे ढर्रों पे वो चल रहे हैं, वो ढर्रे चलते रहे उन ढर्रों से कोई मुक्ति ना मिले लेकिन कष्ट भी साफ़ हो जाए। ऐसा हो नहीं सकता न।

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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
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श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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अभिभावकों से स्वस्थ सम्बन्ध

प्रेम ये नहीं होता कि तुम अपनी मानसिकता कि कोठरी में कैद हो और हम उसी में कैद रहने देंगे। प्रेम कहता है कि भले हमारे-तुम्हारे संबंधों में तनाव आ जाए लेकिन मैं तुम्हें भी मुक्त करके रहूँगा क्योंकि मैंने मुक्ति जानी है और मुक्ति बड़ी आनंदपूर्ण है। तो भले तुम्हें बुरा लगे, फिर भी मैं तुम्हारी साहयता करूँगा। एक-दुसरे को बंधन में डालने का नाम थोड़े ही प्रेम है।

~ आचार्य प्रशांत
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पारिवारिक माहौल से विचलित मन

प्रतिक्षण मन के सामने विकल्प ही विकल्प होते हैं। हम जान नहीं पाते क्योंकि हम ध्यान नहीं देते कि लगातार चुनाव की प्रक्रिया चल ही रही है। मन किस आधार पर चुनाव करता है?

मन इस आधार पर चुनाव करता है कि उसको क्या बता दिया गया है कि महत्त्वपूर्ण है।

तुम जो भी कुछ मन को बता दोगे कि महत्त्वपूर्ण है, मन उसी को आधार बना कर के निर्णय ले लेगा!
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने के और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को व्यर्थ न जाने दें।

तिथि: 24-27 मार्च
आवेदन हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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शराबखाने में और वक़्त बिताने से होश में नहीं आ जाओगे

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ गया कि कोई बूढ़ा होते ही इज्ज़त का पात्र हो जाता है; सवाल ये है कि तुम अपनी देह को किस रूप में देखते हो? क्योंकि जो किसी दूसरे को इस कारण इज्ज़त देगा कि उसके बाल पक गए हैं, वो स्वयं भी यही अपेक्षा रखेगा कि, ‘’मुझे भी मेरी उम्र के अनुसार अब आदर मिले|’’

तुम्हारे मन से ये भावना हट जाए — दूसरे को छोड़ो — तुम्हारे मन से अपने लिए ये भावना हट जाए कि, “मैं शरीर हूँ, और मुझे मेरी उम्र के अनुसार व्यवहार मिलना चाहिए,” तो फिर तुम पूरे संसार को उसकी उम्र की मुताबिक नहीं देखोगे| तुम अपने आप को उम्र के मुताबिक़ देखते हो ना, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्र के मुताबिक देखते हो| तुम कहते हो, “अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मेरी ये उम्र है, वो उम्र है|” जब तुम अपने आप को कहते हो कि, ‘’मैं जवान हूँ. और जवान होने से ये निर्णय होता है कि मुझे क्या करना चाहिए,’’ तो तुम दूसरे को भी कहते हो कि, “अब ये जवान नहीं है और इसकी प्रौढ़ता से निर्णय होगा कि ये क्या करे?”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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जीव के लिए ही मृत्यु है

देह होने का अर्थ ही यही है कि समस्त जीवन का एक ही औचित्य रह जाएगा: मौत से बचना, क्यूंकि जीवन की निष्पत्ति मात्र मृत्यु ही है देह के लिए। देह और कहीं को जा ही नहीं रहा, देह सिर्फ़ मौत की ओर जा रहा है और आप मरना नहीं चाहते। अब आप जो कुछ भी करोगे, आप की सांस-सांस में सिर्फ़ मौत का भय होगा। आप अपने आस-पास के संसार को देखिए, उनकी गतिविधियों को देखिए, आप पाएँगे कि सब कुछ सिर्फ़ मौत के भय से चालित है; आप दुनिया के विस्तार को देखिए, आपको उसमें सिर्फ़ मौत का विस्तार दिखाई देगा।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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