सुधार नहीं विघलन

भूल का कोई सुधार नहीं होता।

कोई आकस्मिक गलती नहीं हुई है – आप जो हो आपसे यही होना था। संयोगवश धोखा नहीं हुआ है, आप जो हो आप बार-बार यही करोगे।

आपके रहते भूल सुधारी नहीं जा सकती, सुधारने की कोशिश मात्र एक प्रपंच है।

भूलों से भरे जीवन को देख अपने मन का ज़रूर पता लग सकता है – यह आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञान में मन, कर्म, जीवन स्वयमेव बदल जाते हैं।

पलायन क्या है ?

पलायन क्या है समझ रहे हो?

मैं कुछ हूँ, एक ठोस जमी हुई संरचना। और वो ठोस संरचना, अपने विगलन को एस्केप करना चाहता है। इसलिए एस्केप शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। उसे बदलाव, परिवर्तन, संशोधन, विगलन इन सबसे बचना है।

अब सवाल ये उठता है कि फ़िर एस्केप क्या नहीं है ? फिर क्या है जो एस्केप नहीं है?

ऐसी एक्टिविटी जो तुम्हारे होने से नहीं निकल रही है, बल्कि तुम्हारे होने को ही परिवर्तित कर देगी। जो तुम्हारे होने को ही बदल देगी। तुम जो साधारण खाना खाते हो, वो कैसा होता है? वो, वही होता है जो तुम खाना चाहते हो। तो वो तुम्हारे मानसिक संरचना को बदल नहीं सकता।

उत्तेजना की चाह ऊब की निशानी है

यदि ज़िन्दगी से ऊब ही हट जाए, तो ऊब के साथ क्या हठ जाएगी? उत्तेजना भी हठ जाएगी ना? पर ऊब होती है ‘पैसिव’ असक्रिय और उत्तेजना होती है ऐक्टिव, सक्रिय। तुम दिन भर घर में ऊबे रहो, तुम कुछ कर नहीं रहे ऊबे हुए हो, पैसिविटी है, अक्रियता है पर दिन भर तुम घर की ऊब मिटाने के लिए जाते हो और एक फ़न राइड ले लेते हो, यह करते हो कि नहीं? शाम को जाएँगे और कहीं एडवेंचर पार्क चले गए और कुछ कर लिया, किसी डिस्को में चले गए और नाच लिया तो यह जो उत्तेजना है। अब यह असक्रिय नहीं है, यह सक्रीय उत्तेजना है, सक्रिय यह पता चलता है। तुमसे कहा जाए ‘’अब बताओ दिन भर दिन भर के बाद जी तुमने क्या किया’’ तो तुम कहोगे ‘’दिन भर तो ऐसा कुछ नहीं शाम को डिस्क गया था, तुम्हें क्या याद है?’’
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

दूर के लक्ष्यों में धूर्तता छुप बैठती है

अगर तुम लक्ष्य की प्रति ईमानदार रहो और लक्ष्य के प्रति ईमानदारी का अर्थ यही होता है कि मेरा लक्ष्य वही है जो मेरे सामने है। भविष्य किसने देखा है ? उसमें तुम कैसे तीर चलाते रहोगे? और ठीक-ठीक बताओ , तुम तीर चला भी लो , तो तुम्हें पक्का है कि तुम वही करना चाहते हो जो आज सोच रहे हो? तुमने कल जो सोचा था, आज भी वही करना चाहते हो? ईमानदारी से बताना। तुमने परसों जो सोचा था क्या तुमने कल वही किया? क्या तुम पंद्रह की उम्र में वही कर रहे थे जो पांच की उम्र में सोचा था? पच्चीस की उम्र में वही कर रहे हो जो पंद्रह की उम्र में सोचा था? ऐसा तो कुछ होता नहीं। न तुम्हारे साथ न किसी और के साथ।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कब सुनोगे उसकी आवाज़?

एक विचित्र सा जमावड़ा है, माहौल है जिसमें आप कभी खेंच कर, कभी धकियाए जाकर डॉक्टर के पास आते हैं पर यह पक्का करके आते हैं कि बीमारी छोड़नी नहीं है। यह ऐसी बीमारी है जिसने अस्पताल को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जो बीमार अस्पताल को भी अपने अनुकूल बना ले उसका कोई इलाज अब संभव नहीं है।
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आंतरिक बीमारी ही बाहर से आकर्षक नकली दवाई बनकर बीमारी को कायम रखती है

कोई बीमार हो, जिसको बीमारी से मोह हो गया हो। वो बीमारी से छूटना भी चाहता है और नहीं भी छूटना चाहता है। तो फिर वो नकली दवाई खाता है, अपने आप को यह बताने के लिए कि “देखो मैं तो सब कुछ कर रहा हूँ, अब बीमारी ही ढीट है, नहीं जाती तो मैं क्या करूँ?” यह सब नकली दवाईयाँ हैं जो हम जान बूझ कर लेते हैं और नकली दवाईयाँ असली को विस्थापित कर देती हैं।
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