बाहर काम अंदर आराम

अब मैं आपसे फिर कह रहा हूँ कि जिसने केंद्र में विश्राम को पा लिया, वो बाहर बड़े तूफ़ान खड़े करेगा और अगर आपकी जिंदगी में सिर्फ़ उदासी है और बोरियत है, गति नहीं है, त्वरा नहीं है, उर्जा नहीं है, बुझा-बुझा सा जीवन है, चार कदम चलने में आप थक जाते हैं, तो उसका कारण बस एक जानिए – आपके भीतर वो अस्पर्शित बिंदु नहीं है। जिसका केंद्र जितना अनछुआ रहेगा, वो परिधि पर उतना ही गतिमान रहेगा। आप अगर पाते हैं कि आपके जीवन में गति नहीं है, तो जान लीजिये कि गड़बड़ कहाँ हो रही है।

एक बुद्ध जब शांत हो जाता है, तो जीवन भर चलता है फिर, क्षण भर को बैठ नहीं जाता। समूचे उत्तर भारत पर छा गया था वो, तूफ़ान बन के। पुरानी रूढ़ियों को, सड़ी गली परम्पराओं को उठा फैंका था। यह तूफ़ान उस शांति से उपजा था, जो बुद्ध को उपलब्ध हुई थी।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार

जब जो होता है उससे तुम राज़ी हो जाते हो, तो तुम्हें फिर वो मिल जाता है, जो तुम्हारे राज़ी होने से आगे की बात है। परमात्मा कहता है कि जब तुझे वो ही पसंद नहीं, जो मैंने तुझे दिया, तो तुझे देने वाला कैसे पसंद आ जाएगा? जो भी उसने तुम्हें दिया है, भले ही उसने तुम्हें बदबू दी है, तुम पहले उसका सहज स्वीकार करो। फिर जिसने दिया है, वो भी तुम्हें मिल जाएगा। मैं तुम्हें कोई उपहार दूँ, तुम्हें वही पसंद नहीं आ रहा, तो तुम्हें देने वाला कैसे पसंद आएगा? तुम जो भी हो, जैसे भी हो, तुम्हें वही मिला है। उसके साथ शान्ति रखो। स्वीकार रखो। वही मिला है तुम्हें।

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जानकर यदि भूल गये तो कभी जाना ही नहीं

सौ साल भक्ति कर के यदि कोई फिसलता है, तो पक्का है कि भक्ति झूठी थी, इसी कारण फिसले। पर अगर कोई सौ साल नरक जैसा जीवन जी करके, एक दिन अचानक जग जाता है, तो ये मत समझ लेना कि जग इसलिए गया क्योंकी वो नरक जैसा जीवन जीया।

‘फिसलने’ के कारण होते हैं, ‘उठना’ कृपा होती है। कारण और कृपा में भेद करना सीख लो। ‘नरक’ के कारण होते हैं, ‘स्वर्ग’ कृपा होती है।
तो सौ साल भक्ति करके, अगर फिसल गए हो, तो कार्य कारण का सम्बन्ध चलेगा। तुम्हारा फिसलना इस बात का सबूत है कि पिछले सौ साल भी झूठे थे।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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बाहरी प्रभावों से मन डगमगाता क्यों है?

दूर कहीं रोशनी है। वो जहाँ तुम खड़े हो, वहाँ हल्की सी दिखाई दे रही है, उसकी बस एक झलक मिल रही है। तुम उसकी तरफ़ दो तीन कदम बढ़ाओ तो क्या होगा? वो रोशनी थोड़ी और तेज़ होगी। चार कदम और बढ़ाओगे तो क्या होगा? वो रोशनी और तेज़ होगी। पर उसकी ओर कदम बढ़ाना होगा और जैसे-जैसे कदम बढ़ाते जाओगे, वैसे-वैसे तुम्हें यकीन होता जाएगा कि, ‘’हाँ रौशनी सच्ची है।‘’ पर उसकी ओर कदम तो बढ़ाओ। एक कदम से अगले कदम की ताकत मिलेगी। पहला जो कदम है, वो तो डरते-डरते ही रखना पड़ेगा क्योंकि रोशनी हल्की है, डरोगे। पहला जो कदम है, वो तो टटोल-टटोल के रखना पड़ेगा। लेकिन जैसे-जैसे कदम बढ़ाओगे, तुम पाओगे कि प्रकाश बढ़ता जा रहा है, तीव्र होता जा रहा है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश
तिथि: 24-27 फ़रवरी

अन्य जानकारी हेतू सम्पर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
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करीब आने का क्या अर्थ है?

तुम अपने सीने में सिर्फ़ डर ही लेकर नहीं घूम रहे। तुम अपने सीने में बोध का बीज भी लेकर के घूम रहे हो। उस बोध के बीज के बिना तो, वह भय भी नहीं आ सकता था! कोई आदमी अगर सूरज को देखना नहीं चाहता और अँधेरे में पनाह मांगता है तो एक बात तो पक्की है, अँधा नहीं है वो। अँधे नहीं हो। बस आदत पाल ली है अँधेरों की, बिलों में छुपने की। और सूरज से भागोगे कैसे? सूरज तुम्हारे ह्रदय में बैठता है। वहाँ कोई अन्धकार नहीं होता। मन को तुम चाहे जितना भर लो अँधेरे से, ह्रदय में तो प्रकाश ही रहता है। तो प्रकाश से भागोगे कैसे? मन कहीं भी जाएगा, कितने भी अँधेरे में छुपेगा, अपने ही स्रोत से, अपने ही केंद्र से कहाँ भागेगा? वहाँ प्रकाश है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है

ये मंदिर तो आपके मन का हिस्सा है। ये मंदिर तो आपकी पुरानी दुनिया को कायम रखने का तरीका है। आप जैसे हो, आपने मंदिर में वैसा ही देवता बैठा दिया है। जैसा आपका मन, वैसी देवता की मूरत। किसके सामने सर झुका रहे हो? जिस देवता की मूरत के सामने सर झुकाया जा रहा है, वो आदमी का अहंकार ही है, जो उसने, मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया है। कुछ बदला नहीं है, और मंदिर के आने से, कुछ बदल सकता भी नहीं है। ये वैसा ही होगा कि किसी को हल्का होना हो, उसने पांच अलग-अलग तरह के, बोझ उठा रखे हों। और वो कहे, ‘’एक छठा बोझ भी उठा लेना है, उससे शायद मैं हल्का हो जाऊं।’’ छठा बोझ, किसी भी तरह का हो, किसी भी रूप का हो, किसी भी प्रकार का हो, सुन्दर से सुन्दर मूर्ति हो, वो पिछले पांच को हटा नहीं रहा है। पिछले पांच के रूप में, हमारा अभिमान तो जम कर के बैठा ही हुआ है ना? वो तो वैसे के वैसे ही हैं। बल्कि इस छठे की सार्थकता ही हम इसी में जानते हैं, इस छठे को शुभ ही हम तभी कहते हैं, जब पिछले पांच बने रहें। यदि छठे के आने से, पिछले पांच की, हानि होती हो, तो हम छठे को, आग लगा देंगे।
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

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