क्या अध्यात्म के माध्यम से अपने कामों में सफलता पाई जा सकती है?|| आचार्य प्रशांत (2019)

अध्यात्म इसीलिए नहीं होता कि तुम्हारे अरमान पूरे हो जाएँ।

अध्यात्म इसलिए होता है कि अहंकार सत्य के सुपुर्द हो जाए।

अहंकार के अरमानों को पूरा करने के लिए नहीं है अध्यात्म, अहंकार के विसर्जन के लिए है।

ऊपर-ऊपर से लीपा-पोती करने के लिए नहीं है अध्यात्म।

मूल परिवर्तन करने के लिए है।

स्वभाव क्या है? || आचार्य प्रशांत (2016)

असल में, दिखना और बदलना एक साथ चलते हैं।

बदलाव अगर नहीं है, तो जो दिखा है वो अधूरा ही है।

तो उसमें तुम्हें आस्था तभी बनेगी जब उसमें उसके साथ जो परिवर्तन आना है, वो देखोगे।

दिखने को ताकत तो उसके साथ आया परिवर्तन ही देता है ।

मन के स्रोत से निकटता ही है मन की ताकत

हमने जीवन में ये सवाल कभी ईमानदारी से पूछा ही नहीं है कि ‘महत्वपूर्ण क्या है’, क्या है जो पाने योग्य है, क्या है जो करने योग्य है? और क्योंकि हमने कभी पूछा नहीं है, हमारे भीतर खाली जगह है इसीलिए उस खाली जगह में कुछ भी कचरा भर दिया गया है।  हमने दुनिया भर के व्यापारियों को अनुमति दे दी है कि वो आएँ और हमारे मन में व्यापार करें। ये अनुमति दी हम ही ने है। समझ रहे हैं? रुकिये और पूछिए ये बात, महत्वपूर्ण क्या है? क्या ये वास्तव में महत्वपूर्ण है। और दो ही चार गिनी हुई चीजें हैं, जो समाज ने बता दी हैं कि महत्वपूर्ण हैं। उनके विषय में पूछिए कि क्या वो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं?
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गलतियाँ और बदलाव

हजार चीजें तो चाहते ही हो न? जिस दिन तुम उसको ही चाहने लग जाओगे, काम हो जाएगा। जितने सवाल पूछ रहे हो, उन सारे सवालों का मूल सवाल ये है कि, “मैं चाहता भी हूँ क्या?” बातें तो बड़ी समझदारी की कर रहे हो, कोई जानना चाहता है बोध के बारे में, कोई प्यार के बारे में, कोई प्रभाव। कोई कुछ-कुछ। लेकिन सवालों का सवाल एक है। चाहते हो? चाहते हो जो, वो मिल जाएगा?

अगर पक्का-पक्का चाहने लगोगे कि वही मिल जाए, तो वो मिल जाएगा।लेकिन तुम चाह सकते नहीं जब तक वो न चाहे कि तुम चाहो।
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खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।
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समझ हमेशा पूरी होती है

आप सिर्फ़ शोर के नामौजूदगी में जान सकते हैं। आप किसी चीज़ को नहीं समझते है, आप समझ में होते हैं। अब मन समझ में है और जब मन समझ में होता है, स्वतंत्र, तो वो बेचैन नहीं होता। तो सिर्फ़ वही देख के आप कह सकते हो कि सब कुछ सही होगा। बेचैनी के अभाव में ही, जागरूकता होती है। आपको कैसे पता कि आप जागरुक हैं? क्यूँकी आप बेचैन नहीं है।
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